Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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गुरु अच्छे कार्य की प्रेरणा एवं ज्ञान की शिक्षा प्रदान

 

गुरु अच्छे कार्य की प्रेरणा एवं ज्ञान की शिक्षा प्रदान करने वाले होते है 

 

गुरु पूर्णिमा भारत में अपने आध्यात्मिक या फिर अकादमिक गुरुओं के सम्मान में, उनके वंदन और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए मनाया जाने वाला पर्व है|ऐसे में माना जाता है कि जिन गुरुओं ने हमें गढ़ने में अपना योगदान दिया है| उनके प्रति हमें कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए और उसे ज़ाहिर करने के दिन के तौर पर ही गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है|पौराणिक मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा को महाभारत के रचयिता वेद व्यास का जन्म दिवस माना जाता है| उनके सम्मान में इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है|इसी कारण उन्हें "आदि गुरु" माना जाता है।व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाने वाली गुरु पूर्णिमा, आषाढ़ माह की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। इस दिन हिंदू धर्म के अनुयायी वेद व्यास को याद करते हैं,जो हिंदू सनातन धर्म के शाश्वत गुरु हैं।उन्होंने ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का वर्गीकरण किया और महाभारत एवं 18 पुराणों की रचना की।गुरु शब्द संस्कृत का है,जो 'गु' (अंधकार या अज्ञान)और 'रु' (अंधकार को दूर करने वाला)से मिलकर बना है।अतः गुरु वह है जो हमारे अज्ञान को दूर करता है|माया से विजय प्राप्त करने में हमारी सहायता करता है और हमें ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर मार्गदर्शन करता है। गुरु पूर्णिमा के दिन भक्त अपने गुरु की स्तुति करते हैं और गुरु पूजा करते हैं। इस दिन शिष्य अपने गुरु का पूजन कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।कबीरदास ने गुरु की महिमा को एक दोहे के माध्यम से समझाया है. वे लिखते हैं-गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में किसी मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है, जो हमें सही दिशा दिखा सके। हमें अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए और उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए।गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।

इस दोहे में कबीरदास ने आम लोगों से कहा है कि गुरु के बिना ज्ञान का मिलना असंभव है| जब तक गुरु की कृपा प्राप्त नहीं होती, तब तक कोई भी मनुष्य अज्ञान रूपी अधंकार में भटकता हुआ माया मोह के बंधनों में बंधा रहता है, उसे मोक्ष (मोष) नहीं मिलता. गुरु के बिना उसे सत्य और असत्य के भेद का पता नहीं चलता, उचित और अनुचित का ज्ञान नहीं होता|नेपाल में गुरु पूर्णिमा को शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जाता है, हालांकि भारत में शिक्षक दिवस गुरु पूर्णिमा के दिन नहीं बल्कि प्रत्येक वर्ष पांच सितंबर को मनाया जाता है|भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु वह दीपक है जो अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। 

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मुझे बचपन की यादें  ध्यान में आती है | स्कूली जीवन की अनगिनत यादों को आज जब याद करते है तो बचपन की यादों में खो कर मुस्कान चेहरे पर आ जाती है ।गुरु अपने ज्ञान और अनुभव को सभी विधार्थियों में बाटते और  दी गई शिक्षा को   हम  सभी ध्यान पूर्वक पढ़ते और समझते थे । गुरु जब कक्षा में आते तो सब खड़े होकर उनका अभिवादन करते और जब परिवार के साथ बाजार में जाते और रास्ते में गुरु मिल जाए तो पापा- मम्मी के संग गुरु को नमस्कार करते ,यही आदर -सम्मान की भावना गुरु से हमसे स्कूल जीवन में सीखी थी जो आज हमारे दिल में बड़े होने एवं बड़े पद पर विधमान होने पर सजीव है । चुनाव का वाक्या याद आता है | जब मुझे पीठासीन अधिकारी पद  और मेरे गुरु जिन्होंने मुझे पढ़ाया था उन्हें  मेरे अंडर में पोलिंग अधिकारी नंबर १  पर नियुक्त किया गया ।चुनाव  में और भी अधिकारी मेरी चुनाव संबंधी सहायता हेतु मेरे साथ थे । चुनाव सामग्री  पद के हिसाब से संभालने  का दायित्व था हम सभी अपनी -अपनी सभी चुनाव सामग्री लेकर बस की और चलने लगे ।मैने देखा की ये तो अपने गुरूजी है | जिन्होंने बचपन में  मुझे पढ़ाया था|  वे अब बुजुर्ग हो चुके थे और उनसे उनकी सभी सामग्री और स्वयं का भारी बेग भी उठाए नहीं जा रहा था ।मैने गुरूजी से कहा - "सर ये सब आप मुझे दीजिए में लेकर चलता हूँ "। गुरूजी ने कहा कि -" आप तो हमारे अधिकारी है आप से कैसे उठवा सकता हूँ " मैने कहा आपने तो हमे शिक्षा के साथ  सिखाया था "आदर सम्मान का पाठ " आप की शिक्षा के बदौलत ही मै आज बड़े पद पर नौकरी कर रहा हूँ ,ये क्या कम है ? मैने ,मेरे  गुरु की चुनावी सामग्री और बैग उठा लिए । गुरु की आँखों में आँसू छलक पड़े और मेरे मन में साहस का हौसला भर गया ।आदरणीय मेरे गुरु अब दुनिया में नहीं है किंतु उनकी यादें आज भी मेरे साथ है जिनसे ज्ञान और अनुभव अब भी प्राप्त करता रहूंगा । यही मेरी गुरु सेवा और सहायता  अच्छे कार्य हेतु सदैव जीवन भर मेरे साथ है एवं मुझे हर वक्त प्रेरणा देती रहती है।  उन्हें मै प्रथम गुरु मानता हूँ। 

संजयवर्मा 'दॄष्टि "
125 शहीद भगतसिंग मार्ग 
मनावर जिला धार 
9893070756
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