गौमाता को राष्ट्र माता का विशेष दर्जा प्राप्त हो
गौपालन हेतु मप्र सरकार भी प्रोत्साहित कर रही है।गौपालन रोजगार की दृष्टि एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम है। विदेशों की बात करें तो उरुग्वे गाय पालन में अग्रणीय है।वहां के नागरिकों को दूध की किल्लत नही आती है।वहां के नागरिकों का स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है।मप्र में छत्तीसगढ़ की तरह गौठान नीति की व्यवस्था होनी चाहिए।साथ ही पशुधन के वैज्ञानिक संवर्धन से दुग्ध-उत्पादन,कृषि एवं शुद्ध पर्यावरण से क्षेत्र को ज्यादा तर्कसंगत बनाया जा सके।हमारे यहां भी गायों की उपयोगिता महत्वपूर्ण है।पुरातन काल से गौपालन कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।गौशाला की संख्या बढ़ाई जाना और उसमें सरकार की तरफ से सुविधाओं का लाभ दिया जाना चाहिए।उल्लेखनीय है कि पिछले वर्षकुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर में गायों के संरक्षण के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया था ।जिसमें प्रदेश की गायों के लिए कई कार्य योजना बनाई गई थी।साथ ही ये भी कहा था कि गुड़ी पड़वा यानी कि हिंदू नव वर्ष को अब से ‘गौवंश रक्षा वर्ष’ के रूप में मनाया जाएगा।राज्य सरकार के नेतृत्व में प्रदेश की गौशालाओं का अधूरा पड़ा निर्माण कार्य पूरा किया जाएगा। गौशाला हेतु सुविधाओं की दरकार है।साथ ही देशी गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा मिलना चाहिए।
गाय से जुडे बहुत से कार्य गाँव तक ही सीमित रह गए है।नई पीढ़ी इससे दूर होती जा रही है।उदाहरण जैसे' गोधूलि वेला' का शाब्दिक अर्थ और समय सिर्फ गाँवो में देखने को मिलता।शाम के समय गायों के घर आते समय उनके पैरों से उड़ी धूल को गोधूलि वेला का शुभ समय आंका गया है।शहरों में पक्की सड़कें होने से औऱ गाय ना पाले जाने से गोधूलि और त्योहारों का महत्व नही समझ में आएगा।इससे जुड़े संजा एवं बज बारस (गाय-बछड़े की पूजा )आदि के त्यौहार भी शहरों से विलुप्त होने लगे |गाय के महत्व एवं पालन के बारे में नई पीढ़ी को समझाना आवश्यक है।देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन गाय पर आधारित है।गुजरात के नड़ियाद में बांसुरी की धुन से एक लाख गाय का इलाज किया गया| बांसुरी की धुन को रिकार्ड कर देश भर की गौशालाओ में आडियो मुफ्त में दिया जाने की पहल की है|बांसुरी की धुन से स्ट्रेस लेवल घटता है|विदेशो में भी अब गाय के स्पर्श को प्राथमिकता दी जाकर स्ट्रेस कम किये जाने का चलन हो भी चूका है|जिससे बींमारी ठीक होती है|गाय हमें सात्विक श्रद्धा प्रदान करती है |पशु पालकों से जो गाय की सेवा पर कम ध्यान देते व उन्हें भूखी प्यासी बाजारों में छोड़ देते है | किन्तु कुछ पहल जो ठीक है जैसे देशी गायों को बचाने वाली राष्ट्रीय नीति बने के साथ देश भर में देशी नस्ल की गायों की संख्या में तेजी से आ रही कमी पर राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल (एनजीटी ) की चिंता करने के साथ राष्ट्रीय नीति तैयार करने की पहल सराहनीय है| आंध्र प्रदेश के पुंगनुर नस्ल की गाय कद में छोटी मगर सुंदरता में सबकी पसंदीदा गाय है | माननीय प्रधान मंत्री एवं मप्र के मुख्यमंत्री जी द्वारा इस नस्ल की संरक्षण करने हेतु स्वयं के द्वारा पालन किया है|जागरूकता लाने के उद्देश्य से गायों की ब्रीडिंग की शुरुआत की गई है |बरसों पहले इस नस्ल को पुंगनूर क्षेत्र के शासकों द्वारा विकसित किया गया था और आज भी यह ज्यादातर इसी इलाके और इसके आसपास तक सीमित है।यह नस्ल कुछ साल पहले तक खत्म होने के कगार पर थी लेकिन राज्य और केंद्र सरकार के प्रयासों से अब इसकी ठीक-ठाक तादाद है।पुंगनूर गाय के मूत्र में एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं और इसका प्रयोग आंध्र प्रदेश के किसान फसलों पर छिड़काव के लिए करते हैं। यह शुष्क वातावरण में भी आसानी से रह लेती हैं और सूखे चारे पर जीवित रह सकती हैं।यह गाय करीब औसत 3 से 5 लीटर दूध देती है| पुंगनुर गाय बहुत ही सुंदर दिखती है| कुछ दिनों पूर्व भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर में गायों के संरक्षण के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादवजी ने प्रदेश की गायों के लिए कई कार्य योजना बनाई।साथ ही ये भी कहा था कि गुड़ी पड़वा यानी कि हिंदू नव वर्ष को अब से ‘गौवंश रक्षा वर्ष’ के रूप में मनाया जाएगा।राज्य सरकार के नेतृत्व में प्रदेश की गौशालाओं का अधूरा पड़ा निर्माण कार्य पूरा किया जाएगा। देशी गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा मिलना चाहिए | गाय का दूध गुणात्मक दृष्टि से अच्छा होने के बावजूद कम मात्रा में प्राप्त होता है |दूध अधिक मिले ,इसके लिए गाय और भैंस का दूध की प्रक्रिया कुछ लोग क्रूर और अमानवीय तरीके से निकालते है|गाय का दूध निकालने से पहले उसके छोटे बछड़े को पिलाया जाना चाहिए।वर्तमान मे लोग बछड़ों का हक़ कम करते है ,साथ ही इंजेक्शन देकर दूध बढ़ाने का प्रयत्न करते है जो की उचित नहीं है | प्राचीन ग्रंथो में कामधेनु ,पदमा आदि गाय का काफी महत्व बताया है।गाय की पूजा की जाती है ,पर्यावरण की दिशा मे गाय के दूध ,गोबर,गोमूत्र ,घी ,दही,आदि का स्वास्थ्य ,हवन-पूजन आदि के कार्यों उपयोग कर लाभ प्राप्त किया जा सकता है। कहते है की गाय को स्पर्श मात्र से व्याधियां दूर होती एवं गोमूत्र चिकित्सा विधि, धार्मिक कार्यो में गंगाजल के समान शुद्धिकरण में उपयोग में लाया जाता है ।भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल के नाम से पुकारा जाता है ।आज भी कई घरो में गाय की रोटी रखी जाती है ,कई स्थानो पर संस्थाए गौशाला बनाकर पुनीत कार्य कर रही है किन्तु दुःख इस बात का होता है की लोग बाग इन पशुओं को भटकने को बाजारों में छोड़ देते है उन्हें इनके भूख प्यास की कोई चिंता ही नहीं |पशुओं के कारण यातायात व्यवस्था भी प्रभावित होती है साथ ही दुर्घटना होने की संभावना बनी रहती है।पशु पालक पशुओं को पालने का शौक रखते है तो उन्हें बाजारों में न छोड़े।उनकी देखभाल अपनी निगरानी में करें तो दुर्घटना घटित होने में कमी आएगी।
सर्वप्रथम तो गोहत्या बंद होना चाहिए।प्रदेश में गोवंश पालने वालों को मिलेगा क्रेडिट कार्ड की खबर भी सुर्खियों में आई | दस से अधिक गोवंश पालने वालों को विशेष अनुदान दिया जाएगा| इससे दुग्ध उत्पादन में देश में मप्र की भूमिका बढ़ेगी | महाराष्ट्र सरकार ने भारतीय संस्कृति,कृषि और स्वास्थ्य देखभाल में स्वदेशी गाय को औपचारिक रूप से 'राजमाता -गौ माता ' का दर्जा दिया है |मध्यप्रदेश में भी " राज्य माता - स्वदेशी गौ माता" का दर्जा दिया जाना चाहिए | माननीय डॉ मोहन यादव जी ने गोवंश हित में लगे रहकर जो पुनीत निर्णय लिए है |उनकी गोवंश सेवा के प्रति भक्ति वाकई प्रेरणादायक है।इससे जागृति अवश्य आएगी | गो भक्ति के सतत प्रयास से आने वाले समय में मध्यप्रदेश नंबर वन पर आएगा |माननीय डॉ मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव जी ने प्रदेश की जनता से अपील की अगर आपके पास के हित पर्याप्त जगह है तो गाय अवश्य पाले| देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन गाय पर आधारित है।।मध्यप्रदेश सरकार 313 विकासखंडों में एक-एक वृंदावन ग्राम बनाएगी।2000 जनसंख्या और 500 गौवंश वाले ग्राम होंगे पात्र की प्रशंसनीय पहल गोवंश के हित मे की है।गौवंश विहार की योजना भी बहुत ही श्रेष्ठ हैगाय की देखभाल भी आवश्यक है क्योकि गाय हमारी माता है एवं गौ रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।अतः मध्यप्रदेश में राज्य माता-स्वदेशी गौ माता" का दर्जा दिया जाना चाहिए। साथ ही इसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए |
तम्बाकू एवं फलों की खेती से पशुओं के लिए चारे के संकट दिनों दिन गंभीर होता जा रहा है।पशुपालन,घी दूध महंगा होता जा रहा है।चारे के अभाव होने से पशुओं के लिए चारे का आहार का प्रतिशत काफी कम हुआ।चरवाह भूमि में बरसात में उगी घास से वे अपना उदर पोषण कर लेते मगर शेष मौसम उनके लिए दुखदायी होते है।पशुओं के लिए खेत मे कुछ भाग चारे जैसी फसल के लिए रखना आवश्यक है।तम्बाकू,एवं फलों आदि की फसल से चारे का पशुओं के लिए मिलना कठिन होता है।महंगे भाव का चारा बाहर गांव जाकर खरीद कर खिलाते है।जो उनके बजट के अनुकूल नहीं होता।खेत भी अब कॉलोनी में तब्दील होते जा रहे है।भविष्य में पशुओं के आहार की समस्या विकराल रूप ले लेगी।कम रुपयों में गांवों में हरा,या सूखा चारा उपलब्ध हो ऐसी व्यवस्था की दरकार है। ताकि पशु आहार सरलता से उपलब्ध हो सकें।
बरगुलिया, बर्बुले,भरभोलिए के नाम से जाना जाता है। गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है।होली पूजन के समय होली पर चढ़ाई जाती है एक माला में सात भरभोलिए होते हैं।होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है।भारतीय जन मानस व संस्कृति में गाय के गोबर का अपना विशेष महत्व है। होली पर भी इसका महत्व देखने को मिलता हैप्रदेश में गोवंश पालने वालों को मिलेगा क्रेडिट कार्ड की खबर समाचार पत्रों में पढ़ने को आई | दस से अधिक गोवंश पालने वालों को विशेष अनुदान दिया जाएगा| इससे दुग्ध उत्पादन में देश में मप्र की भूमिका बढ़ेगी | महाराष्ट्र सरकार ने भारतीय संस्कृति,कृषि और स्वास्थ्य देखभाल में स्वदेशी गाय को औपचारिक रूप से 'राजमाता -गौ माता ' का दर्जा दिया है |मध्यप्रदेश में भी " राज्य माता - स्वदेशी गौ माता" का दर्जा दिया जाना चाहिए |मुख्यमंत्री माननीय डॉ मोहन यादव जी ने गोवंश हित में लगे रहकर जो पुनीत निर्णय लिए है |उनकी गोवंश सेवा के प्रति भक्ति वाकई प्रेरणादायक है।इससे जागृति अवश्य आएगी | गो भक्ति के सतत प्रयास से आने वाले समय में मध्यप्रदेश नंबर वन पर आएगा |माननीय डॉ मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव जी ने प्रदेश की जनता से अपील की अगर आपके पास के हित पर्याप्त जगह है तो गाय अवश्य पाले| देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन गाय पर आधारित है।गाय की देखभाल भी आवश्यक है क्योकि गाय हमारी माता है एवं गौ रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।अतः मध्यप्रदेश में राज्य माता-स्वदेशी गौ माता" का दर्जा दिया जाना चाहिए।बीमारियों की इलाज की लिए म्यूजिक थेरेपी इंसानो पर ही कारगर नहीं है इससे गोवंश का भी इलाज हो रहा है भारतीय संस्कृति में गौ सेवा का प्रमुख स्थान है |गुजरात के नड़ियाद में बांसुरी की धुन सी एक लाख गाय का इलाज किया गया| बांसुरी की धुन को रिकार्ड कर देश भर की गौशालाओ में आडियो मुफ्त में दिया जावेगा |बांसुरी की धुन से स्ट्रेस लेवल घटता है |विदेशो में भी अब गाय के स्पर्श को प्राथमिकता दी जाकर स्ट्रेस कम किये जाने का चलन हो चूका है जिससे बींमारी ठीक होती है |आज भी कई घरों में गाय की रोटी रखी जाती है गोबर से पेंट(रंग)बनाने के गोठान छत्तीगढ़ में शुरू की गई है।मप्र में कई स्थानों पर संस्थाएं गौशाला बनाकर पुनीत कार्य कर रही है । जो की प्रशंसनीय कार्य है ।साथ ही यांत्रिक क़त्लखानों को बंद करने का आंदोलन ,मांस निर्यात नीति का पुरजोर विरोध एवं गौ रक्षा पालन संवर्धन हेतु सामाजिक धार्मिक संस्थाएं एवं सेवा भावी लोग लगातार संघर्षरत है । दुःख इस बात का भी होता है की कुछ लोग गाय को बाजारों में भटकने छोड़ देते है।जयपुर में गाय के भटकने हेतु आवारा शब्द नहीं कहा जाएगा आश्रयहीन कहा जायेगा। गाय हमें सात्विक श्रद्धा प्रदान करती है |गौवंश की महिमा के बारे में ग्रँथों में उल्लेख है।गौ माता का (गोधूलि वेला ) जंगल से घर वापस लौटने का संध्या का समय अत्यंत शुभ एवं पवित्र है।गाय का मूत्र गौ औषधि है।माँ शब्द की उत्पत्ति गोमुख से हुई है।मानव समाज में भी माँ शब्द कहना गाय से सीखा है।जब गौ वत्स रंभाता है तो" माँ" शब्द गुंजायमान होता है।गौ हत्या हो रही है उस पर रोक लगनी चाहिए |गाय का गोबर,मूत्र ,दूध एक धन संपदा के रूप में हमें उपहार देती आई है|जिससे हमारे धार्मिक कार्य पूर्ण होते आये है।गोमाता के सभी अंगों में देवी देवताओं का वास माना गया है।भगवान कृष्ण को जब नज़र लगी थी तो गाय की पूंछ से उनकी नजर उतारने की घटना प्राचीन ग्रँथों में ऐसा उदाहरण पूतना उद्धार में उल्लेख किया गया है।प्राचीन ग्रंथों में सुरभि (इंद्र के पास ) ,कामधेनु (समुद्र मंथन के 14 रत्नों में एक ) ,पदमा ,कपिला आदि गायों महत्व बताया है । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी ने असि ,मशि व् कृषी गोवंश को साथ लेकर महत्व मनुष्य को सिखाए । हमारा पूरा जीवन गाय पर आधारित है। शिव मंदिर में काली गाय के दर्शन मात्र से कालसर्प योग निवारण हो जाता है ।कहते है की गाय के पीछे के पैरों के खुरों के दर्शन करने मात्र से कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है । गाय की प्रदक्षिणा करने से चारों धाम के दर्शन लाभ प्राप्त होता है । क्योंकि गाय के पैरों चार धाम माने गए है ।जिस प्रकार पीपल का वृक्ष एवं तुलसी का पौधा आक्सीजन छोड़ते है। इस प्रकार यदि एक छोटा चम्मच देसी गाय का घी जलते हुए कंडे पर डाला जाए तो एक टन ऑक्सीजन बनती है । इसलिए हमारे यहाँ यज्ञ हवन अग्नि -होम में गाय का ही घी उपयोग में लिया जाता है। प्रदूषण को दूर करने का इससे अच्छा और कोई साधन नहीं है।समुद्र मंथन के रत्नों में एक गोमाता भी निकली थी। धार्मिक आश्रमों, गौशालाओं में गोमाता के आहार एवं स्वास्थ्य की देखभाल हेतु शासन से पर्याप्त सुविधा मिलनी चाहिए ताकि सेवादारों पर आर्थिक भार न पड़े।क्योंकि वे गोमाता की सेवा तो करते ही है किंतु आर्थिक समस्या का भार से मुक्त होकर बिना चिंता के बेहतर सेवा दे सकें।भारतीय संस्कृति में गाय को गौमाता के रूप में पूजा जाता है|गौमाता हमारे धर्म ,संस्कृति और कृषि व्यवस्था का अभिन्न अंग है|अवैध तस्करी,गौवध और लापरवाही के कारण गौवंश की संख्या प्रभावित हो रही है|गौवंश खुले में पड़ी सड़ी -गली वस्तुएं ,प्लास्टिक,कागज़ आदि खाने को मजबूर है|गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा मिलना चाहिए|गौमाता को राष्ट्र माता का दर्जा दिए बिना हम अपनी आत्मा की रक्षा नहीं कर सकते|भारतीय संस्कृति में गौ सेवा का प्रमुख स्थान है| गोवंश की रक्षा हेतु सभी को जागृत रहना होगा माननीय डॉ मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव जी ने प्रदेश की जनता से अपील की अगर आपके पास के हित पर्याप्त जगह है तो गाय अवश्य पाले।धार्मिक ग्रंथों में लिखा है "गावो विश्वस्य मातर :"अर्थात गाय विश्व की माता है।देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन गाय पर आधारित है।गाय की देखभाल भी आवश्यक है क्योकि गाय हमारी माता है एवं गौ रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।अतः मध्यप्रदेश में राज्य माता-स्वदेशी गौ माता" का दर्जा दिया जाना चाहिए।गौ सेवा सम्मान दिवस हेतु विभिन्न धार्मिक व सामाजिक संगठन ,गो-पालक,गो-सेवक,गौ-भक्त ,द्वारा गो -सेवा ,गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने ,गो-संरक्षण और सम्मान के प्रति लोगों में जन जागरण हेतु आगे आना होगा |सर्वप्रथम तो गौमाता की हत्या बंद होना चाहिए। मध्यप्रदेश में भी " राज्य माता - स्वदेशी गौ माता" का दर्जा दिया जाना चाहिए |राष्ट्र आराध्या व विशेष राष्ट्रीय सम्मान और उचित अनुसंधान व् अनुदान उपलब्ध की मान इस अभियान का हिस्सा है | गो भक्ति के सतत प्रयास से आने वाले समय में मध्यप्रदेश नंबर वन पर आएगा |पशुओं के लिए खेत मे कुछ भाग चारे जैसी फसल के लिए रखना आवश्यक है।गाय हमें सात्विक श्रद्धा प्रदान करती है |गौवंश की महिमा के बारे में ग्रंथों में उल्लेख है| गौशालाओं के सेवादारों पर आर्थिक भार न पड़े।क्योंकि वे गोमाता की सेवा तो करते ही है किंतु आर्थिक समस्या का भार से मुक्त होकर बिना चिंता के बेहतर सेवा दे सकें।गोवंश की रक्षा हेतु सभी को जागृत रहना होगा
कहाँ खो गई गोधूलि बेला
शाम को उड़ती धूल में
देखता आकाश की लालिमा
सूरज की धुँधली छवि
सूरज लेता शाम को सबसे अलविदा
गाय के गले में बंधी घंटी
सूरज की करती हो शाम की आरती
गोधूलि की धूल बन जाती गुलाल
धरा से आकाश को कर देती गुलाबी
नित्य ये पूजन चला करता
वर्षा ऋतु में धूल और सूरज छिप जाते
देव कर जाते शयन
ये गाँव की कहानी
शहरों में धूल कहाँ और सूरज भी कहाँ
सीमेंट की ऊंची बिल्डिंग
सड़के डामर की
कहाँ गाय के गले मे आरती की घँटी
गोधूलि का महत्व गाँव मे होता
शहरों में तो काऊ महज पढ़ाया जाता
गाँव प्रकृति से सजा इसलिए तो
सुंदर है
सोचता हूँ
गाँव जाकर प्रकृति को पुनःपहचानू।
संजय वर्मा "दृष्टि "
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