Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

बोझा ढोते बुजुर्ग

 
बोझा ढोते बुजुर्ग

अकेले पानी लाने का 
बोझा ढोते
जबकि इस उम्र में
सहारे की जरूरत होती।
मजबूर पिता को ही
सब काम करना होता
बेटों को तो काम करने में
शर्म महसूस होती
आधुनिक परिवेश की छाया ने
उन्हें घेर लिया है।
उन्हें ये समझना होगा की
बुजुर्ग है तो रिश्ते है ,
नाम है , पहचान है 
अगर बुजुर्ग नहीं तो
बच्चों की  कहानियाँ बेजान है 
आदर सम्मान को करने लगे
 नजरअंदाज अब क्यों
ऐसा लगता जैसे कोई 
आधुनिक दुनिया में 
कोई अपना नही होता।


संजय वर्मा "दृष्टि "
125 शहीद भगतसिंग मार्ग 
मनावर जिला धार (म प्र )
स्वरचित

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ