बोझा ढोते बुजुर्ग
अकेले पानी लाने का
बोझा ढोते
जबकि इस उम्र में
सहारे की जरूरत होती।
मजबूर पिता को ही
सब काम करना होता
बेटों को तो काम करने में
शर्म महसूस होती
आधुनिक परिवेश की छाया ने
उन्हें घेर लिया है।
उन्हें ये समझना होगा की
बुजुर्ग है तो रिश्ते है ,
नाम है , पहचान है
अगर बुजुर्ग नहीं तो
बच्चों की कहानियाँ बेजान है
आदर सम्मान को करने लगे
नजरअंदाज अब क्यों
ऐसा लगता जैसे कोई
आधुनिक दुनिया में
कोई अपना नही होता।
संजय वर्मा "दृष्टि "
125 शहीद भगतसिंग मार्ग
मनावर जिला धार (म प्र )
स्वरचित
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