Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

और आना

 

और आना

विदा होते ही आँखों की
कोर में आँसू आ ठहरते
और आना/जल्द आना
कहते ही ढुलक जाते आँसू
इसी को तो रिश्ता कहते
जो आंखों और आंसुओ के
बीच मन का होता है
मन तो कहता और रहो
मगर रिश्ता ले जाता
अपने नए रिश्ते की और
जैसे चाँद को बादलों से होता
रिश्ता ईद/पूनम का जैसा
दिखता नहीं मन हो जाता बेचैन
हर वक्त निहारती आँखे
जैसे बेटी के विदा होते ही
सजल हो उठती आँखे
कोर में आँसू आ ठहरते
फिर
ढुलकने लगते आँखों में आंसू
विदा होने के पल चेहरे छुपते
बादल में चाँद की तरह
जब कहते अपने -और आना
दूरियों का बिछोह संग रहता है आँसू
शायद यही तो अपनत्व का है जादू
जो एक पल में आँसू
छलकाने की क्षमता रखता
जब अपने कहते -और आना

संजय वर्मा "दृष्टि"
125 शहीद भगतसिंग मार्ग
मनावर जिला -धार (म प्र )

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ