ग़ज़ल
जो यहां पर बो रहें है ख़ार को!!
वो भला समझेंगे क्या इस प्यार को!!
लाख समझाया समझ आया नही
वो हवा बस दे रहे अंगार को!!
साथ रहने का मज़ा कुछ और है
क्या मिलेगा खींच कर दीवार को!!
क्या मिला इस राह पर चल कर तुम्हें
हाथ से तुम फेंक दो हथियार को!!
चार दिन में होंगे हम मंज़िल नशीं
देख कर लगता नहीं रफ़्तार को!!
थामते हथियार को वो हाथ में
काम जब मिलता नही बेकार को!!
हाथ में पत्थर लिए तुम हो खड़े
छापनी पड़ती ख़बर अख़बार को!!
है बहुत कड़वी बताओ क्या करें
देनी पड़ती है
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