मेरी कविता
कोई आडम्बर नहीं
कोई बवंडर भी नहीं
महज इत्तेफाक भी नहीं
यह -----
तुम्हारे मेरे बीच पनपे
रिश्तों का धरातल
तय करती;
तुम्हारी कड़वाहटो का जहर
कंठ में धारण कर
पथरीले रास्तों से
गुजरती
तुम्हारे क्रोध की अग्नि में
झुलसती
तपती
तपकर खरा सोना बनती
मेरी कविता
एक "आस्था" है
तुम्हे पा लेने भर की
एक आस्था।
संदीप तोमर
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