उमड़ी बाढ़ हिम सरिता में
बह रह है अश्रु जल
फिर क्यों बालू सुखी
सागर तट की
मैला रहा चक्षु पथ
क्यों सहमा कम्पन मौजों का?
हुआ जा रहा निराधार
मेरे सपनो का चित्राधार
प्रेम-उटज उजाड़ रह
क्यों रुक रही वीणा की झंकार
क्लिन्न कपोल हुए मेरे
क्यों लुटने को है छल-क्वार?
अमावस्या की रजनी में
कब दिखाई देती चन्द्र-द्युति
व्यर्थ की आंख मिचोली में
रूकती जाती हृदय गति
चिन्ताकुल हैं नयन मेरे
क्यों कर न सकी मैं क्रीडा- कौतुक?
आशा दीप है दिग्भ्रांत
गहरा रहा है आज गिरीश
उदास नयनों में चन्द्र आभा
क्यों बनी चिर-तुसार रेखा
व्यर्थ की आपाधापी में
क्यों मौजें उज्जासन को आतुर ?
संदीप तोमर
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