कविता:-मेरे घर के बाहर की सड़क
S k soyeb
मेरे घर की बाहर की सड़क
फटी है बेहाल है
उम्मीद है उसे
कोई उसका इलाज करे
घाव भरे उसके भी कोई
जिसमें पानीयो का सेहलाब है
गड्ढे जैसे निशान कीचड़ो की दुकान
पूरे शरीर का हुआ बूरा हाल
बेचारी गाड़ियों को उछाल कर कहती
पीड़ा में जीवन है ये संदेश देने की चेष्टा करती
किन्तु न उम्मीदी मे आखिर रह जाती
इलाज पाये बिना ही मर जाती
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