Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मेरे घर के बाहर की सड़क

 

कविता:-मेरे घर के बाहर की सड़क 

S k soyeb


मेरे घर की बाहर की सड़क 

फटी है बेहाल है 

उम्मीद है उसे 

कोई उसका इलाज करे 

घाव भरे उसके भी कोई 

जिसमें पानीयो का सेहलाब है 

गड्ढे जैसे निशान कीचड़ो की दुकान 

पूरे शरीर का हुआ बूरा हाल

बेचारी गाड़ियों को उछाल कर कहती 

पीड़ा में जीवन है ये संदेश देने की चेष्टा करती

किन्तु न उम्मीदी मे आखिर रह जाती

इलाज पाये बिना ही मर जाती

 


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