बुराई के अन्त के बाद
एक बुराई के अन्त के बाद,
एक बुराई ने जन्म लिया।
उगा था वह मानव के भीतर,
रूप-स्वरूप कई अनेक।
ईर्ष्या, लालच, झूठ जैसे,
अंग-रंग मिले अनेक।
स्थान करें वे मन के अंदर,
जलन, क्रोध उसके आहार-भोजन।
करते रहे अन्त रावण का हर साल,
किन्तु बुराई मन में रही,
जिसका कोई नहीं रहा जवाब।
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