Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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बुराई के अन्त के बाद

 

बुराई के अन्त के बाद

एक बुराई के अन्त के बाद,

एक बुराई ने जन्म लिया।

उगा था वह मानव के भीतर,

रूप-स्वरूप कई अनेक।

ईर्ष्या, लालच, झूठ जैसे,

अंग-रंग मिले अनेक।

स्थान करें वे मन के अंदर,

जलन, क्रोध उसके आहार-भोजन।

करते रहे अन्त रावण का हर साल,

किन्तु बुराई मन में रही,

जिसका कोई नहीं रहा जवाब।

 


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