
घुमड़ घुमड़ के बरसे बादल
आई जब बरसात
बरसे वो निर्बाध गति से
पूरा दिन और रात,
वर्षा की बूदों से मेरा भीग गया है तन,
देख छटा वसुधा की अब.
पुलकित हो गया मन.
टर्र टर्र करते है दादुर
म्याव म्याव करे मोर,
झूम झूम कर नाच दिखाते
पंछी चारो ओर.
श्याम वर्ण के मेघ छा गये ,
नीलगगन के आंचल पर
सोच रही हूं मै भी वारू
तन मन ऐसे बादल पर.
Rupa Sharma
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