काव्य सृजन का भाव जगाती,
स्यामल कविता पाठ कराती.
शब्द बने मनकों के जैसे,
भाव सूत्र में बंधें हैं ऐसे,
सुमनमाल में सुमन जैसे,
शारदा बन कर लिखवाती.
शब्द रूप में सुंदर दिखते,
रंग भरी कठपुतली बनते,
डोर खींच के उन्हें हिलाती,
उर आँगन में नृत्य कराती.
हिले शब्द सब कंपन करते,
और कभी सुर में वो हिलते,
हिल डुल कर कविता बनते,
जाने कब उर निर्गन करते.
विषम शब्दों को निअराती,
साज़ स्वरों का मेल कराती,
गौरी कविता तान बनाती,
बिन प्रयास धुन बन जाती.
मुख से वो जब बह जाती,
निर्मल जीवन सुख दे जाती,
कानों में शबनम सी आती,
स्यामा वो कविता करवाती.
समय न कुछ खर्च कराती,
स्यामल कविता पाठ कराती.
'रवीन्द्र'
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