देश की विरासत,
प्राचीनतम संस्कृति,
जनता की समृद्धि,
सीता अर्वाचीन है ।
राजधर्म निहितार्थ,
प्रजा के सिद्ध स्वार्थ,
सभा की स्वीकृति,
मौन तमाशबीन है ।
स्त्री का मूक समर्पण,
अश्रु अम्बु का अर्पण,
सिद्धियों को दे तर्पण,
जन आर्त श्री हीन है ।
नहीं कोख में मरण,
तो अरण्य में भ्रमण,
वा वसुधा में शरण,
आधुनिकता प्राचीन है।
वैभव के अभिलाषी,
अयोध्या के ये वासी,
हैं वैदेही के सब दोषी,
असुर हुए भय हीन हैं ।
बिन तुम्हारे जानकी,
अयोध्या नहीं राम की,
सूर्य- कुल की संस्कृति ,
लंकेश के अधीन है ।
' रवीन्द्र '
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