रोशन हो मशाले हाथ , तो कब कोहरा घना होता है,
डूबती हो मन की आस , तो यकीने खुद खड़ा होता है.
कट ही जाता है वक़्त मेरा , बैठ कर तेरे पहलू में,
भरा हुआ इसमें लम्हा ऐसा, कि हर पल बड़ा होता है.
सकून मिलता है हरदम , जब सामने हो सूरत तेरी,
सूरतें महफ़िल में ऐसीं कि , उजाला भी डरा होता है.
खूब भला किया तुमने , जो थोड़ी सी बेवफाई कर दी,
बे-परवाह हुये महफ़िल से, ना किसी से गिला होता है.
गुज़र ही गई है जिंदगी, बस थोड़ी सी रही बाकी,
ख़तम कहाँ लेकिन ये सफ़र, कि सफ़र नया शुरु होता है.
' रवीन्द्र '
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