सुबह सवेरे की दवा चाहिये,
नजारों में तेरी अदा चाहिये।
जीने का ख़ास यही मक़सद,
साँसों में तेरी ही हवा चाहिये।
बंदिशों की फ़िक्र फिर किसको,
ख्यालों में तेरा ज़िक्र चाहिये।
हज़ार राहें मुन्तज़िर उलफ़त की,
मुहब्बत में तेरी कशिश चाहिये।
न लफ्ज़े-मोहताज़ नायाब नगमें,
नज़्मों को तेरी बस जुबां चाहिये ।
आसान है हर डगर जिन्दगानी,
महज़ तू ही एक हमसफ़र चाहिये।
मिल ही जायेगी मंजिल मुक़द्दस,
दीवानगी में हद से गुज़र चाहिये ।
' रवीन्द्र '
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