प्यार से पुकारा है, इक नज़र के लिए,
करनी है एक इल्तिज़ा, इज़ाजत दे दो,
ख़ता मुआफ़ हो ये, एक बार के लिए,
ना हो फिर ज़रूरत, वो इनायत दे दो ।
परेशां हूँ अपनी, तिज़ारत की आदत से,
छीन के इसको, थोड़ी शराफ़त दे दो ।
याद आती है तेरी, नाशाद लम्हों में,
इश्क़ में रहें हरदम, वो आदत दे दो ।
गम लगता नहीं , इश्क़ की हालत में,
कतरों में या फिर, एक सलामत दे दो ।
इतनी सी गुज़ारिश, मेरे महबूब तुझसे,
इश्क़ को तुम अपनी, हिफाज़त दे दो ।
' रवीन्द्र '
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