अब फिर रातों को सोना मुश्किल हो गया,
दिल के जख्मों को फिर कोई कुरो गया।
आंख बंद करते ही एक तश्वीर नज़र आती है,
जिधर भी देखो हर तरफ मेरा क़ातिल है।
डर नही है मुझे अपने क़त्ल हो जाने का,
मौका मिलेगा दुनिया को, जख़्म दिखाने का।
कत्ल कर बाद में रोएगा क़ातिल,
जिंदगी की मेरी डोर से, बंधी है उसकी मंजिल।
उसके लिए खुदा से दुआ यही करेंगें,
खुश रखना उसे, वह चाहे जहां रहेगें।
आसुओं से उसके, धुल जाए वो गुनाह,
नज़रों में नजरे डालकर उसने जो है किया।
बिखर जाएगें कही ख़्वाब वो, जिसको है सजोया,
बस यही सोचकर रात भर न सोया।
रवि श्रीवास्तव
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY