नन्ही चिड़िया से सीख
आज मन मेरा कुछ उदास था,
जैसे जीवन में किसी विशेष सुख की तलाश थी।
उलझनों के जाल में मन ऐसा उलझा,
मानो हर ओर निराशा का वास था।1
मन को समझाने, स्वयं को बहलाने,
मैं घर से निकल बगीचे में चली आई।
वहाँ एक नन्ही-सी चिड़िया को देखा,
जो तिनका-तिनका जोड़ अपना आशियाना बना रही थी।2
कभी इधर उड़ती, कभी उधर जाती,
परिश्रम से अपने सपनों को सजाती।
नन्हे-नन्हे बच्चों के लिए
दूर-दूर से दाना चुगकर लाती।
अपने कोमल चोंच से उन्हें खिलाती,
ममता की छाँव में उन्हें सुलाती।3
जब उसके बच्चे पंख फड़फड़ाते,
तो उसकी आँखों में अनगिनत दीप जगमगाते।
उसकी निर्मल खुशी को देखकर
मेरा मन स्वयं से प्रश्न करने लगा—
"क्या मैं इस चिड़िया से भी छोटी हूँ,
जो छोटी-छोटी बातों को इतना बड़ा बना लेती हूँ?"4
क्षण भर में जैसे दृष्टि बदल गई,
मन की सारी धुंधलाहट पिघल गई।
जीवन का सरल-सा सत्य समझ आया,
सुख बाहर नहीं, अपने भीतर ही समाया।5
मैं मुस्कुराती हुई घर के भीतर आई,
मन में नई उमंग और नई तरंग समाई।
एक मधुर गीत अधरों पर सजाया,
प्रेम से अपने घर को फिर से सजाया।6
रसोई में जाकर स्वादिष्ट भोजन बनाया,
अपनेपन का स्वाद उसमें घोलती चली गई।
फिर बच्चों की राह निहारती हुई,
प्रतीक्षा की हर घड़ी को प्रेम से भरती गई।7
जब पति ने द्वार पर मुस्कुराते हुए मुझे पाया,
तो जैसे जीवन ने फिर से नया रंग अपनाया।
तब समझ आया—
सुख बड़े अवसरों का मोहताज नहीं होता,
वह तो छोटी-छोटी खुशियों में ही खिलता है।
और जीवन का सबसे सुंदर गीत,
प्रेम, संतोष और अपनत्व से ही मिलता है।8
मौलिक
—रतन खंगारोत
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