वो जमाना और था
जब प्यासा कौआ
मटके में पत्थर डालकर
पानी पिया करता था,
फिर जी भर कर उड़ान
भरा करता
कांव-कांव किया करता था
अब कलियुग में मटके
खाली पड़े हैं
पानी से नही पत्थरों से
अटे पड़े हैं...!!
प्यासे कौए दम तोड़ रहे
राजनीति के कौए
मटकी फोड़ रहे...!!!
मटके का पानी अब
हमारी आंखों में सूख गया,
पानी का सपना
व्यवस्था के सूखे
अंधे कुएं में डूब गया...!!!
क्या बताएं तुम्हें
दिल अब भर गया है
आंखों का पानी भी
मर गया है......!!!!
■ रमाकान्त निगम
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