Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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उम्र सारी चुक गई

 

उम्र सारी चुक गई
जिन्दगी के अंधेरों में
आंसुओं की गठरी
सिसकती भूख के बसेरों में.......!!!!
हम मिट्टी तन लिए
गली गली भटके
मिट्टी के बर्तन लिए........!!
रोशनी तुम्हारी सलामत रहे
हम मिट्टी के दिये बनाते रहे
पेट काटकर.......!!!
चौराहों पर नीलाम हुए सपने
पूछते रोज हम
चाँद सितारों से,
जिन्दगी के घनो
अंधेरों से.......!!!!
■ रमाकान्त निगम
 

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