महानगर की अट्टालिकाओं पर तितलियों के रंग बिरंगे पंख अक्सर झर जाते हैं....!
रात दिन बैचेन गुलदानों के
बॉलकनी में दुबके
मुरझा जाते हैं....!!
बहुत सन्नाटा है कंक्रीट की बस्ती में....
सपने टिमटिमाते बल्बों की रोशनी के दूर छिटक जाते हैं....!!
डोर वैल से बजते रहे मन के सूने आंगन....
आहटों की छटपटाहट
लिए पांव हमारे घर बैठे ही
थक जाते हैं.....!!
गुमसुदगी बचपनों की कौन लिखाए.....
मशीन के कलपुर्जे हुई ज़िन्दगी सुबह से शाम रात हम परछाईं बनकर
रह जाते हैं.....!!
गुम हुए दादा-दादी
नाना-नानी के बिसरे किरदार.....
हर तरफ़ डूबे मझदार....!!
घने अंधेरे रोज बहुत हैं
न कोई चाँद न कोई सितारे
न कोई लल्ला न कोई लोरी
नही कोई अब दूध की कटोरी.....
टूटकर बिखरा बचपन
अलेक्सा से अधूरी कहानियां सुनकर
सिसकते हुए आंसुओं की चादर ओढ़े अब सो जाता है.....!!!!
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY