Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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इंतजाम

 

इंतजाम

पति की मृत्यु के बाद शहर में खाने के लाले पड़ रहे थे | क्योंकि डॉ छोटे-छोटे बच्चों को साथ रखने से कजरी को कोई भी मजदूरी पर नहीं रख रहा था | उसने अपनी और बच्चों की भूख मिटने के लिए एक-एक कर सारा सामान बेच दिया था | अब सिर्फ एक-दो बर्त्तन ही बचे थे,जिसे समेटकर वह शहर से पंद्रह किलोमीटर दूर स्थित अपने गाँव पैदल निकलने वाली थी कि तभी उसके पंद्रह वर्षीय बड़े बेटे ने भूख से बिलबिलाते हुए कहा---‘माँ ! भूख लग रही है | कुछ खाने को दो ना’ |

माँ | बेटे ने कजरी का पल्लू खींचते हुए कहा ‘ बेटा ! कुछ देर रुको,मैं इंतजाम करती हूँ |’ कजरी ने बेबस स्वर में कहा |

‘माँ ! सुबह से ही तुम यही कह रही हो --- | बेटे ने नाराजगी जताई |

तभी एक फेरीवाले ने उसके झोपड़े के सामने से पैदल गुजरते हुए आवाज लगाई—‘बाल बेचो...बाल|’

यह सुनकर कजरी के चेहरे पर भूखे बच्चों की वजह से आई लकीरें कुछ कम हुई | उसने फेरिबाले को रुकने के लिए कहा ,और आखरी बार अपने घने बालों को बड़े प्यार से नाम आँखों से सहलाया और फिर कैंची से काटकर तुलवा दिया |’ 

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