Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मुक्ति

 

मुक्ति


आज स्कूल से आते समय मोहन को खेतो में फिर बुधिया दिखा| बुधिया ने उसे देखा और मुस्कुरा पड़ा |

और बुधिया क्या चल रहा है?

काम पर लगा हूं ,बुधिया हल्की मुस्कान से बोला |

तुम हमारे साथ क्यों नहीं खेलते? मोहन ने मासूमियत से पुछा|

मालिक नाराज हो जायेंगे, बुधिया डरते-डरते बोला |

मोहन-मोहन ; मोहन का ध्यान बुलाने वाले की तरफ गया, उसका मित्र पकोड़ी उसे बुला रहा था |

अच्छा बुधिया कह कर मोहन अपने दोस्त की तरफ दौड़ पड़ा |

यार, यह जमींदार तो बुधिया से हर टाइम सिर्फ काम कराता रहता है,ऐसा क्यों?

मोहन ने पकोड़ी से पुछा |

तुम्हे पता नहीं? पकोड़ी ने गंभीर होकर पुछा?

क्या? 

वोह बंधुआ मजदूर है|पकोड़ी ने कहा,

बंधुआ मजदूर? यह क्या होता है ? मोहन ने पकोड़ी से आश्चर्य से पुछा ?

मुझे नहीं पता यार, पकोड़ी ने मोहन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा |


आज मोहन सोच में था,

पिताजी,पिताजी मोहन ने घर में प्रवेश करते हुए अपने पिता को पुकारा |

“कहो बेटा, आज पिता की याद कैसे आ गई” पिताजी ने मुस्कुराते हुए घर में प्रवेश करते हुए मोहन से पुछा |

पिताजी ,मोहन दोड़ते हए अपने पिता की तरफ भागा और उचक कर उनकी गोदी में बैठ गया| पिता ने स्नेह से उसका आलिंगन कर लिया |

पिताजी, मोहन ने पिता की और स्नेह से देखते हुये पूछा ,” ये बंधुआ मजदूर क्या होता है ?

बेटा, पिता ने गंभीर हो कर पुछा “ तुम्हे यह कहाँ से पता चला ?

पिताजी पकोड़ी बता रहा था, मोहन ने मासूमियत से जवाब दिया |

जमींदार अंकल उसको मारता है ,तंग करता है .भूखा रखता है ,हमसे खेलने भी नहीं देता और तो और हमारे साथ अगर बुधिया खेलता है तो उसे मार पड़ती है और हमे डांट ;हमे बहुत गुस्सा आता है,पर वोह बड़े है और पिताजी आपने हमे समझाया है की बड़े का सम्मान करो ,हम तो आपकी ही बात मान कर चुप है , यह तो पिताजी अत्याचार है ,मोहन ने मसुमियत से बुरा मुहँ बनाते हुआ कहा |

पिता ने मोहन को चुमते हुए कहा “बेटा एक प्रॉमिस करो तो में कुछ बोलूं |

प्रॉमिस ,मोहन ने पिता के गले में झप्पी डालते हुए कहा |

अगर मे बुधिया को जमींदार से आजाद करा दूँ ?

मोहन ख़ुशी से अपने पिता से लिपट गया “ पर तूने मुझसे प्रॉमिस किया है यह बात तुम किसी को भी 

नहीं बताओगे ,पिता ने मोहन के बालो पे हाथ फेरते हुए हँसते हुए कहा |

प्रॉमिस पापा ,गॉड प्रॉमिस , मोहन खुसी में नाचता हुआ घर से बाहर दौड़ गया |


आज सुबह से गाँव पुलिस द्वारा घेरा जा चूका था | जमींदार के हवेली पर पुलिस का नियंत्रण था ,पुलिस ने कई बाल मजदूरो को जमींदार के चुंगल से आजाद करा दिया था उनमे बुधिया भी था |वोह पहले पुलिस देख बहुत डर गया था पर जब उसने जमींदार को पुलिस की हिरासत में देखा और अपने साथ के बच्चो को खुश देखा तो वोह इतना तो समझ गया था की उन सब के साथ कुछ अच्छा तो हुआ है |

 तो क्या पिताजी ने यह सब कराया ? यह कैसे हुआ ? अनेको प्रश्न मोहन के दिमाग में आ रहे थे | आज पिताजी मोहन की नजरो में हीरो बन चुके थे और पिता के प्रति उसका सम्मान बहुत बढ़ चूका था |पापा ,मै भी बड़ा होकर आप जैसा सच्चा और नेक इंसान ही बनूँगा ,मोहन मन ही मन बुदबुदाया और वोह बुधिया से मिलने को दौड़ गया |

इति |

लेखक – राकेश शर्मा 

स्थान – डेराबस्सी 

मोबाइल- 9888607531

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