गाँव
खेत हरे-भरे,
लहलहाते ,
झूमते-गाते |
पतली सी ,
पगडंडीया,
खुरो की छाप उन पर |
टन-टन ,
बजती घंटिया ,
सामूहिक एकता ,
चरते पशु ,
मस्त किसान ,
रिमझिम बारिश की फुहार |
जीवन अटूट ,
लयबद्ध प्रवाह ,
आज मैंने गाँव जो देखा |
कवि - राकेश शर्मा
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY