बुलबुल
बहुत खास रहा इस वर्ष का श्रावण मास,
देखकर हमारे घर को एक बुलबुल को जगी आस।
किया होगा उसने सारे मोहल्ले का निरीक्षण,
और पसंद आ गया उसे मेरे घर का आंगन।
फिर शुरू हुआ तिनका तिनका जोड़ने का हौंसला,
और कुछ ही दिनों में बन गया बुलबुल का घोंसला।
अब आ गई अंडे देने की बारी,
माँ का अंडों पर बैठ, चूज़े निकलने की तैयारी।
अद्भुत था मादा का चोंच में भरकर अपने नन्हे बच्चों को खिलाना,
और नर का चौकीदारी कर आसपास बैठे कौवों को भगाना।
कुछ दिन मेंरे घर की बढ़ाकर शान,
उड़ चले ऊँचे आसमान में नन्हे मेहमान।
इन परिंदों का बिना गंदगी फैलाए रहना यह तथ्य चौंकाने वाला है,
मैने आज भी बुलबुल का छोटा सा आशियाना वैसे ही संभाला है।
अगले साल भी बुलबुल आएगी मेरे आँगन में,
यही छोटी सी आशा है मेरे मन में।
राजेश पाल सिंह।
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