ये आँखे तो दर्पण हैं
अधर पर जो न आ पाये
इन पर हर रोज़ उभरता है
मन का मौसम कैंसा भी हो
इन पर सब कुछ दिखता है
ये आँखे तो .........ये आँखे तो ....
ये आँखे तो दर्पण हैं !
खुशियाँ भी फुहवारे बन कर
गम आते हैं लेकर रिमझिम
अक्स इन पर ऐंसे उभरते
जैंसे मानो हो प्रतिबिंम्ब
ये आँखे तो ......... ये आँखे तो ........
ये आँखे तो दर्पण हैं !
.......रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
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