दुल्हन वही जो पिया मन भाए
भाषा वही जो बात कह जाए
कविता वही जो दिल छू जाए
शब्द-शब्द से खुशबू आए
कभी हँसाए, कभी रूलाए
याद रहे, कभी भूल न पाए
सोते से जो तुम्हें जगाए
जीवन में परिवर्तन लाए
लिखने लगो तो न लिखी जाए
अपने-आप ही बनती जाए
कविता है इस सृष्टि जैसी
बिन रचे ही रचती जाए
रचना में नहीं बसे रचयिता
दुनिया फिर भी उसे ढूँढती जाए
दुनिया कितनी है नादां यारो
कविता छोड़, कवि पूजती जाए
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