अनवरत आंसुओं की झड़ी लग गई,
गंगा जमुना हमारे नयन हो गए।
अब ये बरखा ये सावन के झूले सजन,
सब खुली आंख के से सपन हो गए।
आस की मेहंदी जब अनरची रह गई,
गीत बिन ब्याही दुल्हन से लगने लगे।
और उम्मीदों की पायल के घुंघरू सभी,
टूटते - टूटते अब बिखरने लगे।
छन्द के बन्द मन में ही घुटते रहे,
भाव उठ भी न पाए दफ़न हो गए।
बारिशों में भी तन-मन झुलसने लगा,
हमको परदेस खुद घर की चौखट हुई।
चौंक कर गहरी नींदों से जग-जग गए,
जब भी दहलीज़ पर कोई आहट हुई।
चाह के पंख थक-थक के बोझिल हुए,
मन के अरमां हमारे गगन हो गए।
बदलियां रात दिन ही बरसती रहीं,
चातकी प्यास पर अनबुझी रह गई।
कोई मांझी न उस पार पहुंचा सका,
किश्तियां घाट पर ही बंधी रह गईं।
सहमे- सहमे हुए हम सुलगते रहे,
गीली लकड़ी के जैसे हवन हो गए।
-आर० सी० शर्मा “आरसी”
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