है ज़ख्म अगर तो ये भरता क्यों नहीं
मेरे दिमाग़ से वो शख़्स उतरता क्यों नहीं
न जाने कैसे हादसे ले आया इश्क़
तूफ़ान है अगर तो गुज़रता क्यों नहीं
ग़म दे के मेरा यार देखता है हर घड़ी
अब जान भी ले ली तो ये मरता क्यों नहीं
उसकी यादों ने पलकों पे मेरे हाथ रख दिए
अब दर्द भला दिल में ठहरता क्यों नहीं
ताबूत लिए अपनी फिर रहा हूँ 'प्रतीक'
न पूछना की मैं मौत से डरता क्यों नहीं
प्रेषक- पुरुषोत्तम प्रतीक
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