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अनंत शक्ति का उद्घोष: स्वामी विवेकानंद

 

प्रसंगवश – 12 जनवरी: युग-द्रष्टा स्वामी विवेकानंद की जयंती


अनंत शक्ति का उद्घोष: स्वामी विवेकानंद – भारत की जागृत ज्योति

[एक अनंत मशाल: स्वामी विवेकानंद का जन्म और अविनाशी प्रकाश]

[भारत की सुप्त आत्मा का जागरण: स्वामी विवेकानंद – कालातीत सूर्योदय]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


जब मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ और भारत की उस सनातन आत्मा का स्मरण करता हूँ, जो युगों से सत्य, प्रेम और साहस की प्रेरणा देती रही है, तो मेरे अंतःकरण में स्वामी विवेकानंद का तेजस्वी स्वरूप सजीव हो उठता है। वह स्वरूप केवल एक महापुरुष का नहीं, बल्कि एक युग की चेतना का प्रतीक है; वह वाणी केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि आत्मजागरण का महाघोष है। 12 जनवरी 1863—यह तिथि केवल एक जन्म-दिन नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में प्रज्वलित हुई उस अग्नि का स्मरण है, जिसने सुप्त राष्ट्र को जाग्रत किया और विश्व को भारतीय अध्यात्म की विराटता से परिचित कराया। स्वामी विवेकानंद कोई साधारण संन्यासी नहीं थे; वे उस अमर मशाल के समान थे, जिसकी लौ आज भी मानवता को दिशा दे रही है। उनकी जयंती हमें नमन करने का अवसर देती है—न केवल उनके जीवन को, बल्कि उस आत्मविश्वास, करुणा और निर्भीकता को, जो उन्होंने भारत की चेतना में प्रवाहित की।

स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में हुआ। बाल्यकाल से ही उनके व्यक्तित्व में असाधारण तेज, निर्भीकता और जिज्ञासा स्पष्ट दिखाई देती थी। सत्य को जानने की उत्कंठा, ईश्वर के साक्षात्कार की तीव्र प्यास और तर्कशील बुद्धि उन्हें अपने समकालीनों से भिन्न बनाती थी। 1881 में रामकृष्ण परमहंस से हुई उनकी भेंट उनके जीवन की निर्णायक घटना सिद्ध हुई। रामकृष्ण ने उनके भीतर उस सुप्त सूर्य को पहचान लिया, जो आगे चलकर संपूर्ण विश्व को आलोकित करने वाला था। गुरु के सान्निध्य में नरेंद्र से विवेकानंद बनने की यह यात्रा केवल एक साधक की साधना नहीं थी, बल्कि भारत के आत्मबोध की यात्रा थी।

रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के पश्चात, विवेकानंद ने अपने गुरु के संदेश को विश्व तक पहुँचाने का संकल्प लिया। यह संकल्प केवल आध्यात्मिक प्रचार का नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण का था। 1893 का शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन उनके जीवन का वह ऐतिहासिक क्षण बना, जिसने भारत को वैश्विक मंच पर गौरवपूर्ण पहचान दिलाई। जब उन्होंने “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों” कहकर अपना संबोधन प्रारंभ किया, तो सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट केवल शिष्टाचार नहीं थी—वह विश्व की आत्मा द्वारा भारतीय संस्कृति को दिया गया सम्मान था। सात मिनट के उस भाषण में उन्होंने वेदांत, सहिष्णुता और सार्वभौमिक भाईचारे का जो संदेश दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरक है।

स्वामी विवेकानंद का दर्शन रूढ़ परंपराओं की सीमाओं को तोड़ने वाला था। उन्होंने धर्म को केवल कर्मकांड और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं किया। उनके लिए धर्म का अर्थ था—मानव सेवा, करुणा और निर्भय सत्य। वे स्पष्ट शब्दों में कहते थे, “जो दरिद्र नारायण की सेवा नहीं करता, वह ईश्वर की सेवा का अधिकारी नहीं हो सकता।” उनके इस विचार ने अध्यात्म को जीवन से जोड़ा और सेवा को साधना का सर्वोच्च रूप घोषित किया। 1897 में स्थापित रामकृष्ण मिशन उनके इसी विचार का सजीव उदाहरण है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के माध्यम से आज भी लाखों जीवनों को संवार रहा है।

उनके विचारों की सबसे बड़ी विशेषता थी—आत्मविश्वास की अग्नि। औपनिवेशिक दासता से ग्रस्त भारत को उन्होंने आत्मग्लानि से मुक्त होने का संदेश दिया। उनका उद्घोष—“अपने को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है”—केवल वाक्य नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना को झकझोरने वाला मंत्र था। उन्होंने युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मा में निहित है। उनके शब्दों में जो ओज था, वह आज भी रक्त में बिजली-सी दौड़ जाता है।

स्वामी विवेकानंद का युवाओं पर अटूट विश्वास था। वे मानते थे कि युवा शक्ति ही राष्ट्र की धुरी है। उनका प्रसिद्ध कथन—“मुझे सौ ऊर्जावान युवा दो, मैं भारत का पुनर्निर्माण कर दूँगा”—आज भी हर युवा हृदय को आंदोलित करता है। आज के भारत में, जहाँ युवा जनसंख्या विशाल है, स्वामीजी का यह आह्वान और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। वे युवाओं को केवल स्वप्न देखने के लिए नहीं, बल्कि संकल्प और कर्म के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करते थे।

उनका अमर संदेश—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”—मानव जीवन का शाश्वत सूत्र है। यह संदेश केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान का मार्गदर्शन करता है। विवेकानंद का विश्वास था कि प्रत्येक आत्मा में अनंत सामर्थ्य विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने और जाग्रत करने की है।

शिक्षा के विषय में भी उनका दृष्टिकोण अत्यंत क्रांतिकारी था। वे शिक्षा को सूचना-संग्रह नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण का साधन मानते थे। उनके अनुसार, वही शिक्षा सार्थक है जो मनुष्य को आत्मनिर्भर, निर्भीक और नैतिक बनाती है। आज के युग में, जब शिक्षा प्रायः केवल रोजगार का साधन बनकर रह गई है, स्वामी विवेकानंद के विचार हमें उसके मूल उद्देश्य की याद दिलाते हैं।

स्वामी विवेकानंद का जीवनकाल भले ही संक्षिप्त रहा हो, परंतु उनकी चेतना कालातीत है। वे समय की सीमाओं में बंधे नहीं थे। उनका जन्म केवल 1863 में नहीं हुआ—वे प्रत्येक युग में तब जन्म लेते हैं, जब समाज को दिशा की आवश्यकता होती है। उनकी जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि विचार अमर होते हैं, और जो राष्ट्र आत्मविश्वास खो देता है, वह इतिहास बन जाता है।

आज, स्वामी विवेकानंद की जयंती के पावन अवसर पर, यह आवश्यक है कि हम उन्हें केवल पुष्पांजलि तक सीमित न करें। सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब हम उनके विचारों को अपने जीवन और कर्म में उतारें। उनका जीवन एक चिरस्थायी दीपस्तंभ है, जो अंधकार में भी मार्ग दिखाता है। उनकी अमर वाणी—“तुम अनंत शक्तियों के स्वामी हो”—हर निराश मन को आशा से भर देती है।

स्वामी विवेकानंद का जन्म भारत की आत्मा में उदित हुआ वह सूर्य है, जिसकी किरणें आज भी विश्व को आलोकित कर रही हैं। उनकी जयंती हमें संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम उनके आदर्शों को जीवन में उतारकर राष्ट्र और मानवता की सेवा करें, और भारत को पुनः उस गौरवशाली पथ पर अग्रसर करें, जिसकी कल्पना स्वामी विवेकानंद ने की थी।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com                               



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