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‘यह मेरी गलती है’

 


सिस्टम को झकझोर देने वाला एक वचन: ‘यह मेरी गलती है’

[जनता का दर्द फाइलों में नहीं—एक इंसान की आँखों में पढ़ा गया]

[दमोह मप्र की वह रात, जिसने दिखाया असली प्रशासन क्या होता है]


·प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


सर्द हवा उस रात सिर्फ तापमान नहीं गिरा रही थी, वह व्यवस्था की सड़ चुकी परतों को भी उधेड़ रही थी। मध्यप्रदेश के दमोह के जिला अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर बैठे वे लोग सिर्फ ठंड से नहीं जूझ रहे थे, वे उस तंत्र की बेरहमी से भी लड़ रहे थे, जो फाइलों में “जनहित” की दास्तानें लिखता है, लेकिन जमीन पर जरूरतमंदों के सामने ताले झुलाकर अपनी जिम्मेदारी से भाग खड़ा होता है। रैन बसेरे जैसा आश्रय, जो किसी भी शहर की करुणा का प्रतीक होना चाहिए—वहाँ बेइंतजामी इतनी गहरी थी कि भीतर शराबियों की मौज थी और बाहर मरीजों के परिजन ठिठुरते हुए। भव्य इमारतें, भारी बजट, चमकदार योजनाएँ, और बीचों-बीच इंसानियत का दम घुटता हुआ दृश्य।

और यह सब तब तक किसी की नजर में नहीं आता, जब तक देखने की नीयत वाला कोई न पहुंच जाए। उस रात ऐसा ही हुआ— बिना सूचना, बिना कैमरे और बिना औपचारिक तामझाम के दमोह जिले के जिलाधीश सुधीर कोचर वहाँ पहुंचे। उनके पहुँचते ही एक युवक फफकता हुआ पैरों में गिर पड़ा। उसके आँसू सिर्फ उसकी ठंड नहीं थे, बल्कि व्यवस्था की पत्थर जैसी संवेदनहीनता का सच थे। उसने बताया—दरवाज़ा बंद, कर्मचारियों का बेरहम जवाब—“जगह नहीं है।” माँ अस्पताल में भर्ती, और वह बाहर जमा देने वाली हवा में रात काटने को मजबूर। यह दृश्य किसी भी जागे हुए अंतःकरण को झकझोर देता—और कलेक्टर कोचर वे नहीं, जो सिस्टम की लापरवाही को नियति मानकर आगे बढ़ जाएँ।

उन्होंने न किसी और पर उंगली उठाई, न बहानों का किला खड़ा किया। आरोपों की ढाल ओढ़कर छिप जाने के बजाय, उन्होंने वह किया जिसे सत्ता में बैठे लोग अक्सर याद भी नहीं करते—उन्होंने गलती की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। जनता के बीच हाथ जोड़कर खड़े हुए और साफ कहा—“ यह मेरी गलती है, मेरी जवाबदेही है।” भारतीय प्रशासनिक इतिहास में ऐसे क्षण मोती की तरह दुर्लभ हैं, जब कोई अधिकारी खुद को कटघरे में खड़ा कर जनता के सामने सिर झुकाकर क्षमा माँगे। 

पर असली सार माफी में नहीं था, असली सार उस माफी को सुधार की दिशा में पहले कदम में बदल देने में था। न यह कोई भावुक अभिनय था, न बनावटी रोष, न कैमरों के लिए रचा गया दृश्य। यह वह पल था जब एक इंसान ने अपनी कुर्सी के अहं से ऊपर उठकर इंसानियत को चुना। और फिर—उसी रात सब बदल गया। ताले खुले, शराबियों को बाहर निकाला गया, गद्दे साफ हुए, रज़ाइयाँ बाँटी गईं। नई व्यवस्था बनी—24 घंटे खुला रैन बसेरा, हर रात की निगरानी, हर कर्मचारी की स्पष्ट जवाबदेही। यह सिर्फ आदेशों की श्रृंखला नहीं थी—यह मानसिकता में आया तेज, निर्णायक और ईमानदार परिवर्तन था।

हमारे देश में इमारतों की कोई कमी नहीं, करोड़ों के बजट भी हैं और योजनाओं से भरे चमकदार दस्तावेज़ भी। पर इन सबके बीच जो चीज़ अक्सर गुम रहती है, वह है—ज़मीर। जब ज़मीर सोता है, तो ताले लगते हैं;  ज़मीर जाग जाए तो ताले खुद शर्म से टूट जाते हैं। दमोह की उस रात भी यही हुआ—एक अधिकारी का जागा हुआ ज़मीर पूरे तंत्र के लिए एक तेज़, चुभती हुई चेतावनी बनकर उठ खड़ा हुआ। उस एक जागरण ने दिखा दिया कि सिस्टम को बदलने के लिए बड़ी बैठकों या भारी भरकम आदेशों की नहीं, सिर्फ़ एक जागी हुई आत्मा की ज़रूरत होती है।

अधिकारी दो तरह के होते हैं—एक वे, जो सिर्फ़ कुर्सी से शासन करते हैं; जिनके लिए सत्ता एक ऊँची दीवार भी है और सुविधाओं का सुरक्षा कवच भी। ऐसे लोग फ़ाइलों की दुनिया से बाहर झाँकना भी नहीं चाहते। और दूसरे वे, जो कुर्सी नहीं, ज़मीर से शासन करते हैं—जो रात के धुँधलके में भी सड़क पर उतरने का साहस रखते हैं, जो किसी अनजान मुसाफ़िर की ठिठुरन को अपनी नींद की बेचैनी समझते हैं, और जिनके लिए किसी गरीब की परेशानी मात्र “मामला” नहीं, बल्कि कर्तव्य की पुकार होती है। सुधीर कोचर ठीक इसी दूसरी श्रेणी के अधिकारी हैं, जिनके लिए प्रशासन सेवा है, प्रदर्शन नहीं; और जिनकी पहचान आदेशों से नहीं, उनके ज़मीनी कर्मों से होती है।

उनकी इस कार्रवाई ने एक गहरी और दूर तक सुनाई देने वाली सीख छोड़ी—चूक चाहे किसी एक कर्मचारी की हो या पूरी व्यवस्था की, सच्चा अधिकारी वही है जो साहस के साथ कह सके: “जिम्मेदार मैं हूँ।” यह वाक्य किसी पद का नहीं, यह वाक्य किसी पद की गरिमा नहीं बताता, बल्कि उस व्यक्ति के भीतर बसे नेतृत्व के असली चरित्र का परिचय है। ऐसे अधिकारी बदलाव की बातें नहीं करते, वे उसे अपनी मौजूदगी से महसूस कराते हैं। वे सुधार को फाइलों की पंक्तियों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरकर, लोगों के जीवन में दिखने वाले परिणामों में लिखते हैं।

दमोह की उस रात ने यह सच उजागर कर दिया कि सुधार न तो भारी-भरकम आदेशों से आते हैं, न करोड़ों के बजटों से, और न ही जटिल योजनाओं से। असली सुधार तभी जन्म लेते हैं, जब कोई एक व्यक्ति दृढ़ होकर ठान ले कि “अब और नहीं।” जब किसी इंसान की पीड़ा को वह आंकड़ों की ठंड में नहीं, संवेदना की गर्मी में महसूस करे। और यह बदलाव सिर्फ एक रैन बसेरे की सफाई नहीं करता—यह उस सोच के जंग लगे ताले तोड़ता है, जो अक्सर कंधे उचकाकर कह देती है—“ये मेरा काम नहीं।”

आज दमोह का रैन बसेरा सचमुच गर्म है—रजाइयाँ सिर्फ शरीर नहीं बचा रहीं, वे विश्वास को भी पुकार रही हैं। और शायद इसी पल किसी दूर जिले का कोई अधिकारी यह सोच रहा होगा कि जनता का दर्द कोई फाइल की प्रविष्टि नहीं—उसकी अपनी जिम्मेदारी है। यह घटना सिर्फ एक शहर का प्रसंग नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि पद की कीमत तभी है, जब वह जनता की परेशानी को अपनी समस्या बना ले, अपनी नींद हराम करने लायक समझे।

सुधीर कोचर ने उस रात सिर्फ रैन बसेरे के ताले नहीं तोड़े—उन्होंने पूरे सिस्टम को यह आईना दिखा दिया कि असली प्रशासन काग़ज़ी आदेशों से नहीं, जागी हुई संवेदनाओं से चलता है। उन्होंने साबित कर दिया कि जवाबदेही दूसरों पर थोप देने का नाम नहीं, खुद आगे बढ़कर रास्ता बनाने का साहस है। यह जीत किसी एक अधिकारी की नहीं, उस जिंदा ज़मीर की है जो बार-बार याद दिलाता है कि सत्ता की असली कीमत जनता की राहत और उसकी सुरक्षित रातों से तय होती है। कभी-कभी एक ही रात काफी होती है यह बताने के लिए कि नेतृत्व रिपोर्टों और आँकड़ों से नहीं गढ़ा जाता—नेतृत्व तब जन्म लेता है जब कोई एक व्यक्ति किसी ठिठुरते मुसाफ़िर के आँसू अपने दायित्व की पुकार समझ ले। और दमोह की वह रात इसी सच्चाई का सबसे चमकदार, सबसे निर्भीक प्रमाण बनकर उभरी।



प्रो. आरके जैन “अरिजीत”,

बड़वानी (मप्र) – 451 551

संपर्क: 94251 23883

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

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