Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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वृद्धाश्रम नहीं, सम्मानाश्रम चाहिए

 

अगर आज बुजुर्ग बोझ हैंतो कल हम भी अकेले होंगे

[वृद्धाश्रम नहीं, सम्मानाश्रम चाहिए]

[घर के कोने में नहीं, दिल के सिंहासन पर हों बुजुर्ग]



क्या आपने कभी उन हाथों को गौर से देखा, जो कभी लोरियों की मधुर धुन में आपको थपकियां देते थे, जो आपके डगमगाते कदमों को थामकर चलना सिखाते थे? क्या आपने उन आँखों में झाँका, जो आपके लिए अनगिनत सपनों से सजी थीं, जिन्होंने आपके हर दर्द को चुपके से अपने भीतर समेट लिया? और फिर, क्या आपने कभी सोचा कि वे हाथ, वे आँखें, वे दिल, जो कभी आपके जीवन की नींव थे, आज क्यों कोई उन्हें ‘बोझ’ कहकर पुकारता है? यह सवाल महज एक प्रश्न नहीं, बल्कि समाज के नैतिक दर्पण में झाँकने की एक कठोर चुनौती है। यह उनसे है, जो बुजुर्गों के सुनहरे योगदान को भूलकर उन्हें हाशिए पर धकेल देते हैं। यह उनसे है, जो यह भूल जाते हैं कि उनकी आज की उड़ान उन पंखों की देन है, जो कभी उनके लिए थककर चूर हो गए थे।

बुजुर्गों को ‘बोझ’ कहना महज एक शब्द नहीं, बल्कि एक जहरीली मानसिकता है, जो हमारे समाज की संवेदनाओं को ललकारती है। यह सोच उस नींव को खोखला करती है, जिस पर हमारा परिवार, समाज और संस्कृति टिकी है। बुजुर्ग हमारे समाज के वे विशाल वटवृक्ष हैं, जिनकी छाँव में हमारी जड़ें पनपीं, जिनके अनुभवों की शाखाओं ने हमें जीवन की कठिनाइयों से बचाया। उनकी कहानियाँ, उनकी सीखें, उनका अनमोल अनुभव—ये वो धरोहर हैं, जो किसी किताब में नहीं मिलती। फिर क्यों, आज के दौर में, कुछ लोग इन अनमोल रत्नों को बोझ समझने की भूल करते हैं?

आज का समाज तेजी से भाग रहा है। करियर की अंधी दौड़, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का जाल और स्वार्थ भरी जिंदगी ने हमें इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि हम अपने बुजुर्गों की कीमत भूलते जा रहे हैं। उनकी धीमी चाल को हम कमजोरी समझते हैं, उनकी बार-बार दोहराई बातों को बोरियत मानते हैं। लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर सोचा कि वह धीमी चाल उसी रास्ते की देन है, जिसे उन्होंने हमारे लिए बनाया? उनकी दोहराई जाने वाली कहानियाँ अनुभवों का वह खजाना हैं, जो हमें जीवन की उलझनों से उबार सकती हैं। फिर क्यों हम उनकी आवाज को अनसुना करते हैं? क्यों उनकी मौजूदगी को बोझ मान लेते हैं? यह सवाल हमसे नहीं, हमारे अंतरमन से है—क्या हम वाकई उस समाज के हकदार हैं, जो अपनी जड़ों को ही काट दे? 

बुजुर्गों को ‘बोझ’ कहना केवल एक सोच नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक विडंबना है, जो हमारी संस्कृति की जड़ों को हिलाती है। आज, जब संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में सिमट रहे हैं, बुजुर्ग धीरे-धीरे घर के कोनों में खामोश अकेलेपन में धकेल दिए जा रहे हैं। बच्चे विदेशों की चकाचौंध में खो रहे हैं, नौकरियाँ शहरों की ओर खींच रही हैं, और इस आपाधापी में बुजुर्ग चार दीवारों के बीच अपनी अनसुनी इच्छाओं और भूले-बिसरे सपनों के साथ छूट जाते हैं। क्या यह वाजिब है कि जिन्होंने हमें जीवन की पहली साँस दी, हमारे कदमों को थामा, उन्हें उनके जीवन के अंतिम पड़ाव पर हम अकेला छोड़ दें? क्या यही वह संस्कृति है, जो बड़ों के सम्मान को अपनी शान मानती थी?

यह सच है कि बुजुर्गों की देखभाल समय, धैर्य और संसाधनों की माँग करती है। उनकी बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक और मानसिक ज़रूरतें जटिल हो सकती हैं। लेकिन क्या यह ज़िम्मेदारी हमें बोझ लगनी चाहिए? क्या हम भूल गए कि यही वे लोग हैं, जिन्होंने कभी हमारी खातिर अपनी नींद, अपनी खुशियाँ, अपनी महत्वाकांक्षाएँ त्याग दी थीं? एक माँ, जो रात-रात भर जागकर हमें सुलाती थी, एक पिता, जो अपनी मेहनत की कमाई हमारे सपनों में लगाता था—क्या आज उनकी छोटी-सी ज़रूरतें हमें भारी पड़ने लगी हैं? यह सवाल हर उस दिल से है, जो बुजुर्गों की देखभाल को बोझ समझ बैठता है।

बुजुर्गों का सम्मान और उनकी देखभाल महज कर्तव्य नहीं, बल्कि एक अनमोल अवसर है—उनके अनुभवों से सीखने, उनकी कहानियों में जीवन की गहराई तलाशने और उनके साथ बिताए पलों से अपने जीवन को समृद्ध करने का। उनकी एक मुस्कान, उनका आशीर्वाद, उनकी मौजूदगी उस सारी भौतिक सुख-सुविधाओं से कहीं बढ़कर है, जिनके पीछे हम अंधे होकर भागते हैं। बुजुर्ग घर में वह जीवंत धरोहर हैं, जो नई पीढ़ी को संस्कार, धैर्य और करुणा का पाठ पढ़ाते हैं। उनके अनुभव हमें उन गलतियों से बचाते हैं, जो हम अनजाने में कर बैठते। फिर क्यों हम इस अमूल्य विरासत को बोझ कहकर ठुकराते हैं?

समाज में बदलाव की बुनियाद रखनी होगी। हमें यह समझना होगा कि बुजुर्गों की देखभाल कोई एकतरफा बोझ नहीं, बल्कि एक अनमोल रिश्ता है, जिसमें हम जितना देते हैं, उससे कहीं अधिक पाते हैं। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि बुजुर्गों का सम्मान, उनकी बातों को सुनना, उनकी जरूरतों को संभालना महज कर्तव्य नहीं, बल्कि एक अमूल्य सौभाग्य है। हमें एक ऐसा समाज रचना होगा, जहाँ बुजुर्ग न केवल सम्मान पाएँ, बल्कि उनकी प्रतिभा और अनुभवों को गले लगाया जाए। वृद्धाश्रमों की बजाय सामुदायिक केंद्र हों, जहाँ वे अपनी कहानियाँ, अपनी सीख साझा कर सकें। हमें ऐसी नीतियाँ गढ़नी होंगी, जो उनकी स्वास्थ्य सेवाओं, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी को सुनिश्चित करें, ताकि वे बोझ नहीं, बल्कि समाज की धड़कन बनें।

बुजुर्गों को बोझ कहने वालों से मेरा प्रश्न है—क्या आपने कभी ठहरकर सोचा कि आपकी आज की ऊँचाइयाँ, आपकी सफलताएँ, आपका आत्मविश्वास उस नींव की देन हैं, जिसे आपके बुजुर्गों ने अपने खून-पसीने से सींचा? क्या आप भूल गए कि उनकी मेहनत, उनके त्याग, उनकी दुआएँ आपके जीवन का आधार हैं? अगर आज आप उन्हें बोझ कहते हैं, तो क्या यह नहीं सोचते कि एक दिन आप भी उसी उम्र के मोड़ पर होंगे? क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चे आपको हाशिए पर धकेल दें? यह सवाल एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनाओं, हमारे मूल्यों और हमारी मानवता से है।

हम सब मिलकर एक ऐसा समाज बनाएँ, जहाँ बुजुर्ग बोझ नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक हों। जहाँ उनकी हर झुर्री में बसी कहानी सुनी जाए, उनके हर अनुभव को संजोया जाए। उनके लिए वही प्यार, वही देखभाल, वही सम्मान लौटाएँ, जो उन्होंने कभी हमारे लिए बरसाया था। क्योंकि बुजुर्ग हमारे जीवन का वह अनमोल खजाना हैं, जिसके बिना हमारी जड़ें अधूरी हैं। उनके साथ बिताया हर पल एक उत्सव हो, जो न केवल उन्हें सम्मान दे, बल्कि हमें बेहतर इंसान, बेहतर समाज बनाए। यह बदलाव एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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