ट्रंप की डील बनाम शी की रणनीति: विश्व व्यवस्था की परीक्षा
[रेयर अर्थ से रेयर डील तक: दुनिया थामे इंतज़ार में]
[ट्रंप-शी मुलाकात: शांति की दस्तक या नए शीतयुद्ध की शुरुआत?]
वैश्विक मंच पर दो महाशक्तियों, अमेरिका और चीन, के बीच तनाव की गूंज अब हर अर्थव्यवस्था, हर बाजार और हर कूटनीतिक गलियारे तक पहुंच चुकी है। यह तनाव कोई साधारण विवाद नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक जंग है, जो वैश्विक व्यापार, तकनीक और भू-राजनीति की धुरी को हिला सकती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एशियाई यात्रा, जो 26 अक्टूबर को मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर से शुरू हुई, केवल एक औपचारिक दौरा नहीं है। यह एक शतरंज की बिसात है, जहां टैरिफ की धमकियां, दुर्लभ पृथ्वी खनिजों के प्रतिबंध और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे चालों का हिस्सा हैं। इस यात्रा का चरम बिंदु है ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की छह साल बाद पहली आमने-सामने मुलाकात, जो 30 अक्टूबर को दक्षिण कोरिया के ग्यॉंगजू में एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) शिखर सम्मेलन के दौरान होगी। यह मुलाकात न केवल अमेरिका-चीन संबंधों को नया आकार देगी, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, शेयर बाजारों और भू-राजनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करेगी। सवाल हर किसी के मन में है—क्या यह मुलाकात ट्रेड वॉर की आग को ठंडा करेगी, या इसे और भड़काएगी?
ट्रंप का यह पांच दिवसीय मिशन आसियान शिखर सम्मेलन से शुरू होकर जापान और दक्षिण कोरिया तक फैला है। ट्रंप का का लक्ष्य नए व्यापार समझौते करना है—ऐसे समझौते जो अमेरिकी कंपनियों को एशियाई बाजारों में गहरी पैठ दें और टैरिफ से राजस्व की धारा को मजबूत करें। कुआलालंपुर में ट्रंप ने आसियान नेताओं के साथ वार्ता शुरू की, जहां उन्होंने क्षेत्रीय व्यापार साझेदारी को बढ़ाने का वादा किया। लेकिन सबकी नजरें जापान पर टिकी हैं, जहां वे नई प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची से मिलकर अमेरिकी उद्योगों विशेषकर ऑटोमोबाइल और प्रौद्योगिकी में निवेश की प्रतिबद्धताएं हासिल करने की कोशिश करेंगे। जापान, जो ट्रंप के पहले कार्यकाल में व्यापार घाटे के दबाव में रहा, अब सतर्क कदम उठा रहा है। दक्षिण कोरिया में, जहां 31 अक्टूबर से 1 नवंबर तक एपेक सम्मेलन होगा, ट्रंप का एजेंडा और भी महत्वाकांक्षी है। वे कोरियाई नेताओं के साथ ऑटोमोबाइल पर 25% टैरिफ में राहत जैसे द्विपक्षीय समझौते पक्के करने की कोशिश करेंगे, साथ ही शी जिनपिंग के साथ एक ‘लंबी और महत्वपूर्ण’ बैठक एजेंडे में हैं।
इस यात्रा का असली दांव अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर है, जो 2018 से सुलग रहा है और ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में फिर लपटें उठा रहा है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, अमेरिका की 28 ट्रिलियन डॉलर और चीन की 18-19 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी, अब टैरिफ की लड़ाई से आगे बढ़कर तकनीकी और रणनीतिक वर्चस्व की जंग में उलझी हैं। ट्रंप ने हाल ही में चीनी सामानों पर 100% तक टैरिफ की धमकी दी थी, जिसके जवाब में चीन ने दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (रेयर अर्थ) जैसे नियोडिमियम और डिस्प्रोसियम पर निर्यात प्रतिबंध कड़े कर दिए। ये खनिज सेमीकंडक्टर, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और हथियार प्रणालियों के लिए अपरिहार्य हैं, और अमेरिका इनका 80% से ज्यादा चीन से आयात करता है। विशेषज्ञ इसे शी का ‘पावर प्ले’ मानते हैं, जो वार्ता की मेज पर उनकी स्थिति को मजबूत करता है। लेकिन इस मुलाकात में उद्देश्य आधे रास्ते तय कर चुके हैं। ट्रंप के प्राथमिक लक्ष्य हैं—रेयर अर्थ निर्यात पर राहत, फेंटेनिल तस्करी पर चीनी कार्रवाई, और अमेरिकी सोयाबीन खरीद की बहाली, जो मिडवेस्ट के किसानों के लिए संजीवनी है। 2018-19 के ट्रेड वॉर में अमेरिकी किसानों को 28 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था, और अब चीन की सोयाबीन खरीद रोकने की रणनीति ट्रंप के ग्रामीण वोट बैंक को सीधे निशाना बना रही है। ट्रंप इसे ‘फैंटास्टिक डील’ बनाने की बात कहते हैं, जिसमें चरण एक समझौते का पालन, टैरिफ में स्थिरता और अमेरिकी फर्मों को चीनी बाजार में ज्यादा पहुंच शामिल है।
शी जिनपिंग की रणनीति गहरी और धैर्यपूर्ण है। ट्रंप के पहले कार्यकाल से सबक लेते हुए, वे टैरिफ के झटके सहने को तैयार हैं। इसका कारण यह है कि अमेरिका अब चीन के निर्यात बाजार का सिर्फ चौथा हिस्सा है, और सोयाबीन जैसे संसाधनों के लिए चीन ने ब्राजील जैसे विकल्प तलाश लिए हैं। लेकिन शी घरेलू चुनौतियों से जूझ रहे हैं—17% से ज्यादा युवा बेरोजगारी, एवरग्रैंड जैसे रियल एस्टेट संकट, और 100 ट्रिलियन युआन का स्थानीय सरकारी कर्ज, जो चीन की 5% विकास दर को धीमा कर रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि शी तभी रियायत देंगे, जब ट्रंप उन्नत एआई चिप्स (जैसे एनवीडिया) पर निर्यात प्रतिबंध हटाएं या ताइवान को सैन्य सहायता में कटौती करें। ताइवान का मुद्दा इस मुलाकात को भू-राजनीतिक रंग देता है। ट्रंप ने अमेरिका को ताइवान की सैन्य ढाल बताया है, जबकि शी इसे ‘आंख का तारा’ मानते हैं। हाल की रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन 2027 तक ताइवान पर कब्जे की योजना बना रहा है, जो इस मुलाकात को और जटिल बनाता है। अभी तक, फेंटेनिल तस्करी पर प्रारंभिक सहमति बनी है, लेकिन रेयर अर्थ और चिप्स जैसे बड़े मुद्दों पर गतिरोध कायम है।
ट्रंप की शैली जोखिम भरी और सौदेबाज़ी वाली है। वे खुद को ‘डीलमेकर’ कहते हैं और दावा करते हैं कि यह मुलाकात ऐतिहासिक होगी। लेकिन उनकी अप्रत्याशितता जगजाहिर है—पहले उन्होंने शी से मिलने को ‘बेकार’ बताया, फिर दो दिन बाद बैठक की पुष्टि की। अगले साल चीन यात्रा का उनका संकेत सकारात्मक है, लेकिन अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इसे ‘पुल-असाइड’ यानी अनौपचारिक मुलाकात बताया, जो अपेक्षाओं को संयमित रखने की कोशिश है। दूसरी ओर, शी की रणनीति व्यवस्थित और लंबी है। वे त्वरित परिणामों के बजाय सिस्टमेटिक दबाव बनाते हैं, और उनकी शांत लेकिन दृढ़ शैली ट्रंप की तेजतर्रार अप्रोच से बिल्कुल उलट है।
इस मुलाकात के वैश्विक प्रभाव गहरे हैं। जब भी अमेरिका-चीन वार्ता रुकती है, नास्डैक में 2-3% की गिरावट आम है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं—दक्षिण कोरिया के चिप कारखाने, वियतनाम की फैक्ट्रियां, दक्षिण चीन सागर के जलमार्ग—खतरे में हैं। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर निर्भर हैं, लेकिन उनके व्यापार की रीढ़ चीन है। ट्रंप के टैरिफ ने पहले ही कोरियाई ऑटो उद्योग को चोट पहुंचाई है, और जापान निवेश में सावधानी बरत रहा है। अगर ट्रंप जापान से निवेश गारंटी या दक्षिण कोरिया से टैरिफ राहत हासिल कर लें, तो यह उनकी बड़ी जीत होगी। लेकिन असफलता का मतलब है ट्रेड वॉर का और गहराना, जो वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ाएगा और आर्थिक विकास को 1-2% तक धीमा कर सकता है।
इस मुलाकात का परिणाम ट्रंप के बाकी कार्यकाल की दिशा तय करेगा। ट्रंप की त्वरित परिणामों की चाहत और शी की लंबी रणनीति के बीच टकराव इस मुलाकात को ऐतिहासिक बनाता है। अगर यह सफल होती है, तो वैश्विक बाजारों में स्थिरता आएगी, आपूर्ति श्रृंखलाएं सुरक्षित होंगी, और तनाव कम होगा। लेकिन अगर यह विफल होती है, तो एक नया ट्रेड वॉर शुरू होगा, जो न केवल अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन को भी बिगाड़ देगा। जैसे ही ट्रंप कुआलालंपुर से अगले पड़ाव की ओर उड़ान भरते हैं, दुनिया सांस रोके इंतजार कर रही है। यह मुलाकात शांति का क्षण लाएगी, या तनाव का नया अध्याय खोलेगी? यह सवाल न केवल वाशिंगटन और बीजिंग, बल्कि टोक्यो, सियोल और वैश्विक कॉरपोरेट बोर्डरूम्स में गूंज रहा है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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