Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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विश्व की छत” दरक रही है

 

हिमालय की बर्फ नहींभविष्य पिघल रहा है

[हिमालय की छाती पर जलवायु परिवर्तन का घाव]

[“विश्व की छत” दरक रही है — क्या हम अब भी मौन रहेंगे?]



“जब हिमालय की बर्फ पिघलती है, तो केवल ग्लेशियर नहीं, हमारी सभ्यता की जड़ें हिल जाती हैं।” हिमालय, भारत की जीवनरेखा, आज अभूतपूर्व संकट के मुहाने पर खड़ा है। वैज्ञानिकों की चेतावनी गूंज रही है: अगले दस वर्षों में 1000 से अधिक हिमनद (ग्लेशियर) पूरी तरह लुप्त हो सकते हैं। इसका दंश सिर्फ बर्फीले शिखरों तक नहीं रुकेगा—गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां, जो करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं, सूखने की कगार पर हैं। सवाल गहरा है: क्या 2035 तक उत्तर भारत पानी के लिए तड़पेगा? यह महज चेतावनी नहीं, बल्कि एक आसन्न तबाही की दस्तक है। 

हिमालय, जिसे 'विश्व की छत' कहा जाता है, दक्षिण एशिया की जलवायु और जल संसाधनों का आधारस्तंभ है। इसके ग्लेशियर, जो गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को जीवन देते हैं, भारत की कृषि, पेयजल और उद्योगों की रीढ़ हैं। मगर ग्लोबल वॉर्मिंग की आग में ये बर्फीले पहाड़ तेजी से पिघल रहे हैं। एक हालिया अध्ययन चीख-चीखकर बता रहा है कि हिमालय के ग्लेशियर 20वीं सदी की तुलना में दोगुनी रफ्तार से गायब हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवायु वैज्ञानिकों की रिपोर्ट और साफ चेतावनी देती है: यदि कार्बन उत्सर्जन पर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई, तो 2035 तक हिमालय के एक तिहाई से अधिक ग्लेशियर लुप्त हो जाएंगे। यह महज आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक भयावह भविष्य की आहट है। गंगा और यमुना, जो उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल की जीवनरेखा हैं, पहले ही जल संकट से जूझ रही हैं। गंगा का जलस्तर कई स्थानों पर ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है। ग्लेशियरों के पिघलने से पहले बाढ़ का कहर बरपेगा, फिर ये नदियां सूखकर रेगिस्तान की धूल बन जाएंगी। इसका परिणाम? खेती तबाह, पेयजल संकट और आजीविका का विनाश। यह चेतावनी नहीं, बल्कि आने वाली तबाही का शंखनाद है।

हिमालय की गोद में बसी उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था और संस्कृति नदियों की धड़कन पर टिकी है। गंगा के तट पर बसे हरिद्वार, वाराणसी, कानपुर, पटना जैसे शहर न केवल आस्था और संस्कृति के केंद्र हैं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का आधार भी हैं। मगर ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना इन नदियों की सांसें छीन रहा है। इसका सबसे गहरा घाव कृषि पर पड़ेगा। भारत का 'अन्न भंडार' कहलाने वाले पंजाब और हरियाणा पहले ही भूजल की कमी से त्रस्त हैं। यदि गंगा और यमुना का जलस्तर और गिरा, तो सिंचाई के लिए पानी की किल्लत फसलों को तबाह कर देगी। यह संकट खेतों तक सीमित नहीं रहेगा—शहरी पेयजल आपूर्ति पर भी गहरा संकट मंडराएगा। दिल्ली, जो पहले ही यमुना के सूखने से जूझ रही है, अब अभूतपूर्व जल संकट की कगार पर है। साथ ही, हिमालयी नदियों पर निर्भर जलविद्युत परियोजनाएं ठप होने के कगार पर हैं, जिससे ऊर्जा संकट का अंधेरा गहराएगा।

ग्लेशियरों का पिघलना सिर्फ पर्यावरणीय त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सुनामी की आहट है। जल संकट से खाद्य असुरक्षा बढ़ेगी, खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूएंगी, और गरीब-मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर टूट जाएगी। पानी की बढ़ती मांग क्षेत्रीय युद्धों को भड़का सकती है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच नदियों के पानी के बंटवारे पर पहले से ही तलवारें खिंची हैं; ग्लेशियरों के पिघलने से यह तनाव और विस्फोटक हो सकता है। हिमालयी क्षेत्रों की स्थानीय जनजातियां और समुदाय भी इस आपदा की चपेट में हैं। बाढ़ और भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं—जैसा कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हाल के वर्षों में देखा गया—पहाड़ी जीवन को खतरे में डाल रही हैं। यह महज संकट नहीं, बल्कि एक ऐसी तबाही की दस्तक है, जो हमारी सभ्यता की नींव हिला सकती है।

हिमालय के ग्लेशियर वैश्विक तापन की दहकती भट्ठी में तेजी से गल रहे हैं और इस विनाश की जड़ में है मानव की असीम स्वार्थपरता। जीवाश्म ईंधनों का अंधाधुंध दोहन, वनों की निर्मम कटाई और औद्योगिक धुएँ का बढ़ता जाल — ये सब मिलकर पृथ्वी की साँसें घोंट रहे हैं। विश्व के तीसरे सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक के रूप में भारत इस संकट से पल्ला नहीं झाड़ सकता। ऊपर से, हिमालयी क्षेत्र में बेलगाम पर्यटन, अवैध खनन और बाँध निर्माण ने इस श्वेत शृंखला के सीने पर ऐसे घाव दे दिए हैं जो धीरे-धीरे उसकी जीवन-रेखा को निचोड़ रहे हैं।

इस आसन्न तबाही से निपटने के लिए तुरंत और एकजुट कदम उठाने होंगे। पहला, कार्बन उत्सर्जन पर लगाम कसने के लिए भारत को सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों में निवेश को रफ्तार देनी होगी। जंगलों की कटाई पर सख्त रोक और हिमालय में पर्यावरण-अनुकूल नीतियां अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता हैं। दूसरा, जल प्रबंधन को क्रांति की जरूरत है—वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, और कुशल सिंचाई तकनीकों को अपनाना होगा। स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए प्रशिक्षित और सशक्त करना समय की मांग है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी इस जंग में अहम हथियार है। हिमालयी ग्लेशियरों का संरक्षण भारत अकेले नहीं कर सकता; दक्षिण एशियाई देशों को मिलकर ग्लेशियर संरक्षण, जल बंटवारे, और जलवायु अनुकूलन की साझा रणनीति बनानी होगी।

हिमालय का पिघलना महज पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के लिए एक अस्तित्वगत खतरा है। गंगा और यमुना केवल नदियां नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और जीवन की धड़कन हैं। यदि हम अब नहीं जागे, तो 2035 तक उत्तर भारत पानी की एक-एक बूंद को तरस सकता है। यह समय बहस या चेतावनियों को अनसुना करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां सूखे और संकट की विरासत न पाएं। हिमालय की पुकार गूंज रही है—क्या हम उसका जवाब देंगे, या चुपचाप उसकी तबाही का मातम मनाएंगे?


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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