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विश्व छिपकली दिवस

 

[प्रसंगवश – 14 अगस्त: विश्व छिपकली दिवस] - छिपकली: डर और भ्रांतियों के पीछे छुपा पर्यावरण मित्र

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RITESH KUMAR JAIN 

AttachmentsWed, Aug 13, 10:00 AM (19 hours ago)



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[प्रसंगवश – 14 अगस्त: विश्व छिपकली दिवस]


छिपकली: डर और भ्रांतियों के पीछे छुपा पर्यावरण मित्र

[पर्यावरण के स्वास्थ्य का जीवित सूचक: छिपकली]



विश्व छिपकली दिवस हमें उस छोटे से जीव की ओर ध्यान आकर्षित करने का अवसर देता है, जिसे हम अक्सर दीवारों पर रेंगते हुए नजरअंदाज कर देते हैं। छिपकली, जो नजरों में साधारण और कभी-कभी डरावनी लगती है, वास्तव में प्रकृति की एक ऐसी कृति है, जो अपने अनोखे गुणों, जैविक महत्व और सांस्कृतिक प्रतीकवाद के कारण विशेष सम्मान की हकदार है। यह जीव न केवल पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न हिस्सा है, बल्कि यह हमें अनुकूलन, लचीलापन और पर्यावरणीय संतुलन की गहरी सीख भी देता है। 

छिपकलियां, जो लगभग 6000 प्रजातियों में विश्व भर में फैली हैं, अपनी विविधता और अनुकूलनशीलता के लिए अद्भुत हैं। गेको से लेकर गिरगिट तक, इगुआना से लेकर कोमोडो ड्रैगन तक, ये जीव आकार, रंग और व्यवहार में इतने भिन्न हैं कि इन्हें प्रकृति का जीवंत कैनवास कहा जा सकता है। कुछ छिपकलियां, जैसे गिरगिट, रंग बदलने की अपनी क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं, जो न केवल शिकार से बचाव बल्कि संचार का भी एक अनोखा तरीका है। दूसरी ओर, उड़ने वाली छिपकलियां (फ्लाइंग गेको) पंख जैसे त्वचा के विस्तार के सहारे हवा में ग्लाइड कर सकती हैं। यह विविधता हमें बताती है कि छिपकलियां केवल रेंगने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की रचनात्मकता का एक जीवंत प्रमाण हैं।

इन जीवों का पारिस्थितिक योगदान अनमोल है। एक सामान्य घरेलू छिपकली (जैसे हेमिडैक्टाइलस फ्रेनाटस) प्रतिदिन 10-20 कीड़े खा सकती है, जिसका अर्थ है कि एक वर्ष में यह हजारों कीटों को नियंत्रित करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, मच्छरों जैसे कीटों से होने वाली बीमारियां, जैसे मलेरिया और डेंगू, हर साल लाखों लोगों को प्रभावित करती हैं। छिपकलियां इन कीटों को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करके न केवल मानव स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं, बल्कि कीटनाशकों के उपयोग को भी कम करती हैं, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं। उदाहरण के लिए, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां छिपकलियां घरों और खेतों में आम हैं, ये फसलों को कीटों से बचाने में अप्रत्यक्ष रूप से किसानों की मदद करती हैं। यह योगदान आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कीटों से होने वाला नुकसान वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादन का 20-40% तक हो सकता है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने अनुमान लगाया है।

छिपकलियों की पुनर्जनन क्षमता एक और आश्चर्यजनक विशेषता है, जो वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है। जब कोई छिपकली अपनी पूंछ खो देती है, तो वह न केवल नई पूंछ उगा लेती है, बल्कि इसमें हड्डी, मांसपेशियां और तंत्रिकाएं भी विकसित हो जाती हैं। यह प्रक्रिया स्टेम सेल अनुसंधान और पुनर्योजी चिकित्सा के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल है। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक इस प्रक्रिया का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या मानव शरीर में अंगों या ऊतकों के पुनर्जनन को संभव बनाया जा सकता है। यह संभावना क्रांतिकारी हो सकती है, खासकर उन लोगों के लिए जो दुर्घटनाओं या बीमारियों के कारण अंग खो देते हैं। इस तरह, छिपकली न केवल प्रकृति की रक्षा करती है, बल्कि मानवता के भविष्य को बेहतर बनाने में भी योगदान दे सकती है।

हालांकि, छिपकलियों का अस्तित्व आज खतरे में है। विश्व संरक्षण संघ (आईयूसीएन) के अनुसार, लगभग 20% छिपकली प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। शहरीकरण, वनों की कटाई, और रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग इनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहा है। उदाहरण के लिए, भारत में आम गृह छिपकली (हाउस गेको) की संख्या शहरी क्षेत्रों में घट रही है, क्योंकि कंक्रीट की इमारतें और स्वच्छता के नाम पर कीटनाशकों का उपयोग उनके लिए जीवित रहना मुश्किल बना रहा है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन ने भी उनके प्रजनन और व्यवहार को प्रभावित किया है। गर्म होती जलवायु के कारण कुछ प्रजातियों में अंडों का तापमान-निर्भर लिंग निर्धारण प्रभावित हो रहा है, जिससे लिंग अनुपात में असंतुलन पैदा हो रहा है। यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है, क्योंकि छिपकलियां खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

छिपकली का सांस्कृतिक महत्व भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत में, विशेष रूप से दक्षिण भारत में, छिपकली की आवाज को शुभ या अशुभ संकेत के रूप में देखा जाता है, जिसे “पल्ली शास्त्र” के नाम से जाना जाता है। यह मान्यता, हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत न हो, छिपकली के प्रति लोगों की गहरी जिज्ञासा और सम्मान को दर्शाती है। इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी समुदायों में, छिपकली को सृष्टि की कहानियों में एक महत्वपूर्ण पात्र के रूप में देखा जाता है, जो धरती और आकाश के बीच संतुलन का प्रतीक है। प्राचीन मिस्र में, छिपकली को पुनर्जनन और अनंत जीवन का प्रतीक माना जाता था। ये सांस्कृतिक संदर्भ हमें यह याद दिलाते हैं कि छिपकली केवल एक जीव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की कहानियों और विश्वासों का हिस्सा भी है।

छिपकलियां पर्यावरणीय स्वास्थ्य की सूचक भी हैं। उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति किसी क्षेत्र के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का संकेत देती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी बगीचे में छिपकलियां अचानक गायब हो जाएं, तो यह रासायनिक प्रदूषण, कीटों की अधिकता या प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलन का संकेत हो सकता है। वैज्ञानिक इन जीवों का उपयोग करके जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, जैसे तापमान वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव, का अध्ययन करते हैं। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि छोटे से छोटा जीव भी हमारे ग्रह की सेहत का एक महत्वपूर्ण थर्मामीटर हो सकता है।

छिपकली का जीवन हमें कई जीवन-प्रेरणाएं भी देता है। उनकी सतर्कता हमें सिखाती है कि हमें अपने परिवेश के प्रति हमेशा जागरूक रहना चाहिए। उनकी पूंछ पुनर्जनन की क्षमता यह संदेश देती है कि विपत्तियों के बाद भी नया निर्माण संभव है। उनका शिकार पकड़ने का धैर्य हमें बताता है कि सही समय का इंतजार सफलता की कुंजी है। ये गुण हमें न केवल जीव विज्ञान, बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी प्रेरित करते हैं।

विश्व छिपकली दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम इन जीवों के प्रति अपनी सोच को बदलें। हमें उनके आवास की रक्षा करनी चाहिए—बागानों में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कम करना, उनके प्राकृतिक आवास को संरक्षित करना, और उन्हें मारने के बजाय सुरक्षित रूप से बाहर निकालना। स्कूलों और समुदायों में जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को इनके महत्व के बारे में शिक्षित करना भी जरूरी है। बच्चों को यह सिखाना कि छिपकली दुश्मन नहीं, बल्कि प्रकृति की सहयोगी है, भविष्य के लिए एक सकारात्मक कदम हो सकता है।

विश्व छिपकली दिवस हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति का हर जीव, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, इस ग्रह के संतुलन में एक अनमोल भूमिका निभाता है। छिपकली, जो दीवारों पर चुपके से रेंगती है, वह केवल एक जीव नहीं, बल्कि प्रकृति का एक मौन प्रहरी है, जो बिना किसी अपेक्षा के पर्यावरण की रक्षा करता है। यह दिन हमें यह सिखाता है कि हमें इस छोटे से जीव के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए, और इसके अस्तित्व को सुरक्षित रखने का वादा करना चाहिए। क्योंकि, जब तक दीवारों पर छिपकलियां रेंगती रहेंगी, तब तक हमारी धरती की कहानी जीवंत और संतुलित रहेगी। 


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)


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