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विकास नहीं विनाश है प्लास्टिक का साथ

 

विकास नहीं विनाश है प्लास्टिक का साथ

[हमारी सुविधा, प्रकृति की सज़ा: प्लास्टिक - वो ज़हर जो दिखाई नहीं देता]


धरती की कोख से हर दिन कुछ नया जन्म लेता है—पेड़, पौधे, जीवन, साँसें। लेकिन आज उस कोख में एक ऐसी चीज़ पनप रही है, जो न तो जीवन देती है, न ही साँसों को सहारा। वह है प्लास्टिक—वह ज़हर, जो चुपके-चुपके हमारी मिट्टी, पानी और हवा को निगल रहा है। हर बार जब हम बाज़ार से सब्ज़ियाँ या सामान लाते हैं, एक चमकदार प्लास्टिक बैग हमारे हाथों में होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि यही बैग, जो हमें सुविधा लगता है, किसी गाय की आंत में फंसकर उसकी जान ले सकता है? या किसी समुद्री जीव की साँसों को हमेशा के लिए रोक सकता है? 3 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग फ्री दिवस हमें यही सवाल पूछता है—क्या हमारी छोटी सी सुविधा धरती के भविष्य से ज्यादा कीमती है?

प्लास्टिक बैग, जो कभी आधुनिकता और सुविधा का प्रतीक था, आज पर्यावरण के लिए अभिशाप बन चुका है। विश्व स्तर पर हर साल लगभग 500 बिलियन प्लास्टिक बैग उपयोग किए जाते हैं, यानी प्रति मिनट लगभग 1 मिलियन बैग। इनमें से अधिकांश बैग एक बार इस्तेमाल के बाद कचरे के ढेर में, नदियों में, या समुद्रों में पहुँच जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, हर साल 8 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक समुद्रों में प्रवेश करता है, जिससे समुद्री जीवों की 100,000 से अधिक मौतें होती हैं। ये आँकड़े डरावने हैं, लेकिन इससे भी भयावह है वह तथ्य कि प्लास्टिक को पूरी तरह विघटित होने में 500 से 1,000 साल तक लग सकते हैं। इस दौरान यह माइक्रोप्लास्टिक में टूटकर हमारे खाद्य चक्र में घुस जाता है। वैज्ञानिक अनुमान लगाते हैं कि एक औसत व्यक्ति हर हफ्ते लगभग 5 ग्राम माइक्रोप्लास्टिक—यानी एक क्रेडिट कार्ड के वज़न के बराबर—निगल लेता है। यह सोचकर ही मन सिहर उठता है कि हम अनजाने में अपने शरीर को प्लास्टिक का भंडार बना रहे हैं।

प्लास्टिक बैग की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यह सस्ता और आसानी से उपलब्ध है। इसकी सर्वसुलभता ने हमें इसकी लत लगा दी है। दुकानों पर हम बिना सोचे प्लास्टिक बैग ले लेते हैं, भले ही वह कुछ मिनटों के लिए ही उपयोग हो। भारत में हर साल लगभग 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैग का है। ये बैग नालियों को जाम करते हैं, बाढ़ का कारण बनते हैं, और मिट्टी की उर्वरता को नष्ट करते हैं। नेशनल जियोग्राफिक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 3 लाख से अधिक गायें प्लास्टिक खाने के कारण मर जाती हैं। फिर भी, हमारी आदतें नहीं बदलतीं। क्या यह उचित है कि हमारी सुविधा के लिए नदियाँ दम तोड़ें, खेत बंजर हों, और जीव-जंतु तड़प-तड़प कर मरें?

लेकिन इस अंधेरे में भी आशा की किरण है। बदलाव संभव है, और वह बदलाव हमसे शुरू होता है। अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग फ्री दिवस हमें याद दिलाता है कि छोटे-छोटे कदम बड़े परिणाम ला सकते हैं। कपड़े या जूट का थैला अपनाना, दुकानदार को पॉलिथीन देने से मना करना, और बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना—ये वो बीज हैं, जो एक हरे-भरे भविष्य को जन्म दे सकते हैं। विश्व भर में कई देश इस दिशा में प्रेरणादायक कदम उठा रहे हैं। केन्या ने 2017 में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जिसमें उल्लंघन करने वालों के लिए जुर्माना और जेल की सजा तक का प्रावधान है। यूरोपीय संघ ने 2021 तक सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीके से हटाने का लक्ष्य रखा, और कई देशों ने प्लास्टिक बैग पर कर लगाकर उनके उपयोग को हतोत्साहित किया। भारत में भी महाराष्ट्र, तमिलनाडु, और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने प्लास्टिक बैग पर कठोर प्रतिबंध लगाए हैं। लेकिन कानून तभी प्रभावी होंगे, जब हम, नागरिक, उन्हें व्यवहार में अपनाएँ।

विकल्प हमारे सामने हैं। जूट, कपास, और बायोडिग्रेडेबल सामग्री से बने थैले न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि टिकाऊ और स्टाइलिश भी हैं। कई स्टार्टअप और स्थानीय कारीगर इनके निर्माण में लगे हैं, जो न केवल पर्यावरण की रक्षा करते हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में 'चलो बैग' और 'बायोबैग' जैसे ब्रांड्स ने बायोडिग्रेडेबल और पुनर्चक्रण योग्य थैलों को लोकप्रिय बनाया है। इसके अलावा, कुछ शहरों में 'थैला बैंक' जैसी पहल शुरू हुई हैं, जहाँ लोग कपड़े के थैले उधार ले सकते हैं और उपयोग के बाद लौटा सकते हैं। ये छोटे-छोटे प्रयास दिखाते हैं कि बदलाव की शुरुआत हो चुकी है।

हमें यह समझना होगा कि प्लास्टिक बैग का बहिष्कार केवल पर्यावरणीय कदम नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व है। यह उस धरती के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है, जिसने हमें जीवन दिया। यह उन जीव-जंतुओं के प्रति हमारा कर्तव्य है, जो हमारी गलतियों की सजा भुगत रहे हैं। और सबसे बढ़कर, यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा वादा है कि हम उन्हें एक ऐसी धरती सौंपेंगे, जहाँ साँस लेना आसान होगा, जहाँ नदियाँ स्वच्छ होंगी, और जहाँ जीवन पनपेगा, न कि प्लास्टिक।

3 जुलाई का यह दिन केवल एक तारीख नहीं है। यह एक आह्वान है—हमारे भीतर के उस योद्धा को जगाने का, जो सुविधा से ज्यादा प्रकृति को चुने। यह वह दिन है, जब हम अपने घर से, अपनी गली से, अपने बाज़ार से एक नई शुरुआत कर सकते हैं। हर बार जब हम एक प्लास्टिक बैग को मना करते हैं, हम एक साँस बचाते हैं—किसी पक्षी की, किसी मछली की, या शायद अपनी ही। आइए, इस अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग फ्री दिवस पर एक संकल्प लें। वह थैला, जो हमारे हाथ में है, आखिरी हो। वह पन्नी, जो हमारी सुविधा बनती है, आखिरी हो। क्योंकि बदलाव का पहला कदम हमेशा असहज होता है, लेकिन वही कदम इतिहास रचता है। हम इतिहास रचें—एक स्वच्छ, हरित, और प्लास्टिक-मुक्त भविष्य का इतिहास। एक ऐसी धरती का, जहाँ फिर से फूल खिलें, नदियाँ गाएँ, और जीवन मुस्कुराए। यह हमारा वादा है, हमारा संकल्प है—न केवल आज के लिए, बल्कि हर उस कल के लिए, जो हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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