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Dr. Srimati Tara Singh
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विकास का अपडेट आ गया, इंसानियत क्रैश हो गई

 

विकास का अपडेट आ गयाइंसानियत क्रैश हो गई

[प्रगति की ट्रेन चली, इंसानियत पटरी पर रह गई]

[नया भारत: जहां वाई-फाई फुल बार, इंसानियत नो सिग्नल]



रोशनी से चकाचौंध इस दुनिया की चमक में खड़े हम यह भूलते जा रहे हैं कि विकास सिर्फ चमकते शीशों, ऊँची इमारतों और तेज़ रफ्तार सड़कों का नाम नहीं है। यह वह क्षण भी है, जब किसी पुल के बनने के साथ किसी बूढ़े की झोपड़ी टूट जाती है; जब किसी फैक्ट्री की चिमनी से उठता धुआँ किसी बच्चे के सीने में हर रात खाँसी बनकर बैठ जाता है; जब किसी नए शहर की योजना किसी नदी की साँसें रोक देती है। हम गर्व से कहते हैं कि हम आगे बढ़ रहे हैं, पर असली सवाल यह है—किस कीमत पर? और इसका सबसे कटु, सबसे भयावह उत्तर यही है: इंसानियत की कीमत पर।

आज विकास का अर्थ “हमने क्या हासिल किया” से कहीं ज्यादा “हमने क्या गंवा दिया” में सिमटता जा रहा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम इतने डूब चुके हैं कि यह देख ही नहीं पाते कि हर नई मेट्रो लाइन किसी बस्ती को निगल जाती है, हर एक्सप्रेसवे के किनारे किसी किसान की ज़मीन इतिहास बन जाती है। सरकारें विकास को आँकड़ों में नापती हैं, उद्योगपति मुनाफों में, और आम लोग सुविधाओं में—पर इस पूरे हिसाब-किताब में इंसान की संवेदना, प्रकृति की टीस और समाज की धड़कन कहीं खो जाती है।

यही कारण है कि “प्रगति” शब्द जितना चमकदार दिखता है, अंदर से उतना ही खोखला महसूस होता है। विकास के नाम पर किए गए जबरन विस्थापन, जंगलों की बेरहमी से कटाई, नदियों का दम घोंटता प्रदूषण, मशीनों का शोर, फैक्ट्रियों का धुआँ और शहरों की बढ़ती भीड़—ये सब हमारे ही द्वारा रचे गए ऐसे दानव हैं जो अब हमारे सामने खड़े होकर हमारे अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं। दुखद यह है कि हमने इन्हें पैदा भी खुद किया और इनसे लड़ने की तैयारी भी नहीं की।

सवाल यह नहीं कि हमें विकास चाहिए या नहीं; असली सवाल यह है कि हम किस तरह का विकास चाहते हैं। क्या हम ऐसा विकास चाहते हैं जो इंसान को इंसान से दूर कर दे, रिश्तों को कमजोर कर दे और हाथों को मशीनों का पुर्जा बना दे? या फिर वह विकास, जो तकनीक के साथ दिलों को भी जोड़ सके, जो सुविधाएँ बनाए पर संवेदनाएँ न तोड़े? हम स्मार्ट सिटी तो बना रहे हैं, लेकिन क्या हम स्मार्ट इंसान भी बना पा रहे हैं? मोबाइल टावरों से नेटवर्क जरूर तेज़ हो गया है, पर क्या दिलों के नेटवर्क भी इतने ही मजबूत हुए?

विकास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसने हमें “व्यस्त” तो बना दिया, पर “समर्थ” नहीं। हम तकनीक के सहारे दुनिया की दूरियाँ मिटा सकते हैं, पर पास बैठे किसी व्यक्ति के आँसू पोंछने का समय नहीं निकाल पाते। हम आधुनिक चिकित्सा के युग में हैं, लेकिन दिल की बीमारियाँ बढ़ रही हैं; हम सोशल मीडिया के युग में हैं, लेकिन अकेलापन पहले से अधिक गहराता जा रहा है। तो क्या यही वह भविष्य है जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी—एक ऐसा भविष्य जहाँ मशीनें चमकें पर दिल बुझ जाएँ, और सड़कें चौड़ी हों लेकिन संवेदनाएँ संकरी पड़ जाएँ?

हमने प्रगति को सिर्फ सुविधाओं की चमक तक सीमित कर दिया है, जबकि असली विकास तब होता है जब समाज केवल समृद्ध नहीं, संवेदनशील भी बने। मशीनें चलें, पर मनुष्य का दिल न रुके। शहर आगे बढ़ें, पर उनके बढ़ते नक्शों में पेड़ों की कब्रगाहें न बनें। उद्योग फले-फूले, पर उनकी सफलता की कीमत नदियों की मौत न हो। यही वह संतुलन है जिसे हम भूलते जा रहे हैं।

हमें यह समझना होगा कि जिस धरती पर हम खड़े हैं, जिस हवा से हम साँस लेते हैं, जिस पानी से जीवन की हर धड़कन चलती है—उसी को हम विकास के नाम पर धीरे-धीरे खत्म करते जा रहे हैं। अगर यह रफ्तार नहीं थमी, तो एक दिन हमें यह कटु सत्य स्वीकार करना पड़ेगा कि हमने प्रगति की ऊँची इमारत तो खड़ी कर ली, पर उसकी नींव में अपनी ही इंसानियत, अपनी ही करुणा दफना दी। अब वक्त आ गया है कि विकास के नक्शे में संवेदना की भी एक मोटी रेखा खींची जाए। प्रगति का मानक सिर्फ जीडीपी, हाईवे या इमारतें नहीं होने चाहिए, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उन प्रोजेक्ट्स से कोई रोया या मुस्कुराया; कोई उजड़ा या बस गया; किसी जीव ने अपना घर खोया या पाया।

समाज को ऐसे विकास की जरूरत है जो तकनीक के साथ सहानुभूति, सुविधाओं के साथ न्याय, और उद्योगों के साथ पर्यावरण को भी महत्व दे। जब तक विकास इंसान के दिल से ऊपर रखा जाएगा, तब तक उसका कोई भी रूप अधूरा ही रहेगा। हमें अपने बच्चों के लिए ऐसा भविष्य गढ़ना होगा जिसमें वे सिर्फ मशीनों, मोबाइल स्क्रीन और कंक्रीट की दीवारों से घिरे न हों, बल्कि प्रकृति की जीवंत हरियाली, परिवार की सच्ची गर्माहट, और समाज की मानवीय करुणा को भी उतनी ही गहराई से महसूस कर सकें। ऐसा भविष्य, जहाँ प्रगति के नाम पर दिल पत्थर न बनें, बल्कि इंसान और इंसानियत दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।

विकास अनिवार्य है—पर उससे कहीं अधिक अनिवार्य है इंसानियत का ज़िंदा रहना। चौड़ी सड़कों का क्या अर्थ, यदि दिलों की राहें संकरी पड़ जाएँ? ऊँची इमारतों का क्या सौंदर्य, यदि उनके साए में खड़े लोग मुस्कुराना ही भूल जाएँ? उज्ज्वल भविष्य वही कहलाएगा, जिसमें प्रगति की नींव पर प्रकृति की हरियाली, संवेदना की सुगंध और मानवता की गर्माहट एक साथ खिलें। आखिरकार, हमें स्वीकार करना ही होगा कि प्रगति की पहचान कंक्रीट, कांच और चमकते ढाँचों से नहीं होती—वह पहचानी जाती है उन धड़कते दिलों, जागती संवेदनाओं और जीवित करुणा से जो किसी भी समाज की असली पूँजी होती हैं। विकास की सच्ची विजय तभी संभव है जब हम यह विश्वास के साथ कह सकें—हम आगे बढ़े, पर किसी को पीछे नहीं छोड़ा; हमने उन्नति की, पर इंसानियत को गिरवी नहीं रखा।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)



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