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विजयादशमी

 

विजयादशमी: बुराई चाहे बाहर हो या भीतरअंत तय है

[विजयादशमी: धर्मयुद्ध से आत्मयुद्ध तक की यात्रा]

[रावण दहन प्रतीक है, आत्मविजय ही वास्तविक पर्व]



विजयादशमी का पावन पर्व भारतीय संस्कृति का वह अमर अध्याय है, जो सत्य, धर्म और मानवता की विजय का प्रतीक है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक गहन दर्शन है, जो हमें आत्ममंथन और आत्मविजय की ओर प्रेरित करता है। यह वह अवसर है जब हम अपने भीतर और बाहर के रावण—अहंकार, लोभ, क्रोध, और सामाजिक अन्याय का सामना करने का प्रण लेते हैं। विजयादशमी हमें सिखाती है कि सच्ची जीत वही है, जो मर्यादा, धैर्य और करुणा के पथ पर चलकर हासिल की जाए। यह पर्व हमें हमारी समृद्ध परंपराओं से जोड़ता है और आधुनिक चुनौतियों के बीच भी प्रासंगिकता का नया प्रकाश दिखाता है।

रामायण की कथा से प्रेरित यह पर्व श्रीराम की रावण पर विजय की गाथा का स्मरण कराता है। उत्तर भारत में रावण दहन इस दिन का सबसे प्रतीकात्मक क्षण है। जब विशाल रावण का पुतला अग्नि में जलता है, तो यह केवल एक प्रतीकात्मक अंत नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली संदेश है—बुराई का विनाश निश्चित है। लेकिन यह पर्व हमें बाहरी रावण से ज्यादा भीतर के रावणों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, अहंकार, ईर्ष्या, घृणा, भय और द्वेष पर विजय पाने की चुनौती देता है। यह आत्मचिंतन का अवसर है, जो हमें अपने मन की गहराइयों में उतरकर अपनी कमियों को पहचानने और सुधारने की प्रेरणा देता है।

विजयादशमी का महत्व केवल राम-रावण की कथा तक सीमित नहीं। पूर्वी भारत, विशेषकर बंगाल, असम और ओडिशा में, यह पर्व माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में मनाया जाता है। दुर्गा पूजा के अंतिम दिन, माँ की प्रतिमा का विसर्जन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शक्ति, साहस और दृढ़ता का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि चाहे बुराई कितनी भी प्रबल हो, उसे परास्त करने की शक्ति हमारे भीतर ही है। दक्षिण भारत में ‘आयुध-पूजा’ और ‘विद्यारंभ’ के रूप में यह पर्व कर्म और ज्ञान के प्रति श्रद्धा का संदेश देता है। किसान का हल, कारीगर का औजार, या विद्यार्थी की किताब—विजयादशमी हमें याद दिलाती है कि हमारे साधनों की सार्थकता तभी है, जब उनका उपयोग समाज के कल्याण के लिए हो।

महाराष्ट्र की ‘सीमोल्लंघन’ परंपरा एक अनूठा दर्शन प्रस्तुत करती है। आप्टे वृक्ष (बौहिनिया रेसेमोसा) के पत्तों को “सोना” कहकर बांटने की रस्म केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि यह सिखाती है कि सच्ची समृद्धि धन में नहीं, बल्कि धर्म, परिश्रम और समर्पण में निहित है। यह हमें अपनी सीमाओं को लांघने, नई शुरुआत करने और साहस के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। गुजरात में नवरात्रि के बाद गरबा और दांडिया की रंगीन छटा के साथ विजयादशमी सामूहिक एकता और उल्लास का प्रतीक बनकर उभरती है। यह पर्व हमें जोड़ता है—अतीत से, वर्तमान से, और एक बेहतर भविष्य के सपने से।

विजयादशमी का ऐतिहासिक महत्व इसके धार्मिक स्वरूप को और गहराई देता है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसी पावन दिन शस्त्र-पूजन कर स्वराज्य की रक्षा का संकल्प लिया, जिसने विजयादशमी को केवल एक धार्मिक पर्व से कहीं आगे बढ़ाकर राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक बना दिया। स्वतंत्रता संग्राम में भी यह पर्व स्वाधीनता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा। 1857 की क्रांति से लेकर 20वीं सदी के आंदोलनों तक, विजयादशमी ने अन्याय के खिलाफ संघर्ष की चेतना को प्रज्वलित किया। आज भी यह पर्व हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का बोध कराता है, साथ ही एकता और साहस का संदेश देता है।

आधुनिक युग में विजयादशमी का महत्व और भी प्रासंगिक हो उठता है। आज का रावण कोई मिथकीय चरित्र नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, पर्यावरण विनाश, सामाजिक असमानता और नैतिक पतन के रूप में हमारे सामने है। रावण दहन का दृश्य हमें यह प्रश्न करने को विवश करता है—क्या हम इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ साहस के साथ खड़े हैं? क्या हम अपने जीवन में सत्य, ईमानदारी और नैतिकता को प्राथमिकता दे रहे हैं? विजयादशमी हमें सिखाती है कि सच्ची विजय तभी संभव है, जब हम व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर सकारात्मक बदलाव के लिए कटिबद्ध हों। यह पर्व हमें न केवल आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा देता है, बल्कि समाज को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी भी सौंपता है।

विजयादशमी का एक अनमोल पहलू है इसका पर्यावरणीय संदेश। रावण दहन और दुर्गा विसर्जन जैसे आयोजन, यदि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाएँ, तो पर्व का सच्चा उद्देश्य अधूरा रह जाता है। आज हमें यह चिंतन करना होगा कि हमारी परंपराएँ प्रकृति के साथ सामंजस्य कैसे स्थापित करें। पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों से बने पुतले और मूर्तियाँ, साथ ही सामुदायिक जागरूकता, इस पर्व को नई सार्थकता प्रदान कर सकते हैं। यह एक नई विजय है—प्रकृति पर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मिलकर जीतने की विजय। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब हम अपने पर्यावरण और परंपराओं के बीच संतुलन बनाएँ।

विजयादशमी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व इसके आध्यात्मिक स्वरूप को और समृद्ध करता है। रामलीला, दुर्गोत्सव और गरबा जैसे आयोजन समाज को एक सूत्र में बाँधते हैं, सामूहिकता की शक्ति का जीवंत प्रदर्शन करते हैं। जब लाखों लोग रावण दहन के साक्षी बनते हैं या माँ दुर्गा की आरती में एक स्वर में शामिल होते हैं, तो यह केवल धार्मिक उत्साह नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का उत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि गरीबी, अशिक्षा या असमानता जैसी चुनौतियों का सामना तभी संभव है, जब हम एकजुट होकर, सामूहिक संकल्प के साथ आगे बढ़ें। विजयादशमी हमें याद दिलाती है कि सच्ची शक्ति समाज की एकता में निहित है।

विजयादशमी का केंद्रीय संदेश है आत्मविजय। यह पर्व हमें अपने भीतर झाँकने और अपनी कमियों—अहंकार, क्रोध, लोभ—पर विजय पाने की प्रेरणा देता है। श्रीराम ने रावण को सुधरने के अनेक अवसर दिए, माँ दुर्गा ने महिषासुर के अहंकार को तोड़ने के लिए नौ दिन तक संघर्ष किया। यह हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति बाहरी बल में नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण, मर्यादा और करुणा में है। विजय का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन धैर्य, संयम और दृढ़ता के साथ असंभव कुछ भी नहीं। यह पर्व हमें आत्ममंथन का अवसर देता है, ताकि हम अपने जीवन को और अधिक सार्थक बना सकें।

विजयादशमी हमें गहन प्रश्नों से रूबरू कराती है—हमारा राम कौन है? हमारा आदर्श कौन है? और हमारा रावण कौन है? यह पर्व हमें सत्य, धर्म और न्याय के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है, जो हमें सिखाता है कि सच्ची विजय तलवार या शक्ति से नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा, नैतिकता और समाज के प्रति जिम्मेदारी से प्राप्त होती है। विजयादशमी की यह शाश्वत प्रासंगिकता इसे हर युग में जीवंत और प्रेरणादायी बनाती है, जो हमें न केवल उत्सव मनाने, बल्कि एक बेहतर इंसान और समाज के निर्माण की ओर प्रेरित करती है।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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