[प्रसंगवश – 09 सितंबर: वर्गीज कुरियन पुण्यतिथि]
दूध की हर बूँद में क्रांति का घोष — वर्गीज़ कुरियन
[श्वेत क्रांति का शिल्पकार — जिसने भविष्य को दूध में गढ़ा]
भारत की पावन धरती पर इतिहास ने एक साधारण इंजीनियर को क्रांति का मुकुट पहनाया, वह थे वर्गीज कुरियन। उन्होंने दूध की हर बूंद को आजादी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना दिया। अमेरिका की प्रयोगशालाओं से लौटे युवा कुरियन गाँवों की मिट्टी में उतरे और लाखों किसानों की किस्मत बदल दी। उनकी पुण्यतिथि, 9 सितंबर, ग्रामीण भारत के जागरण का अमिट प्रतीक है। 9 सितंबर 2012 को गुजरात के नडियाद में उनका देहांत हुआ, लेकिन अमूल के रूप में उनकी विरासत अमर हो गई। अमूल न केवल दूध बेचती है, बल्कि करोड़ों सपनों को पोषण देती है। यह दिन हमें झकझोरता है: क्या हम सफेद क्रांति की लौ को प्रज्वलित रख पाए हैं?
कुरियन का जन्म 26 नवंबर 1921 को केरल कालीकट (कोझिकोड) में एक सीरियाई क्रिश्चियन परिवार में हुआ। उनका हृदय कभी जाति-धर्म या सीमाओं से बंधा नहीं। दूध या डेयरी इंजीनियरिंग उनकी प्राथमिकता न थी; सरकारी छात्रवृत्ति के लिए उन्होंने मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग चुनी, सोचते हुए कि स्वतंत्र भारत को परमाणु ऊर्जा चाहिए। लेकिन 1949 में आनंद पहुँचकर उनका भाग्य बदला। वहाँ एक छोटी क्रीमरी में किसानों का संघर्ष देखा, पोल्सन जैसी विदेशी कंपनियाँ दूध सस्ते में लूट रही थीं, शहरों में दोगुना दाम बेचकर किसानों को भुखमरी की ओर धकेल रही थीं। त्रिभुवनदास पटेल के साथ कुरियन ने सहकारी समिति की नींव रखी। उन्होंने किसानों को नारा दिया: "दूध है आपकी ताकत"। यह ताकत बिचौलियों को उखाड़ फेंकने वाली थी। 13 मई 1949 को शुक्रवार को आनंद पहुँचकर उन्होंने दूध उद्योग को नई दिशा दी, और सफेद क्रांति की बाढ़ आ गई।
कुरियन को 'श्वेत क्रांति के जनक' कहा जाता है, लेकिन यह उनकी महानता को सीमित करता है। उन्होंने दूध को सामाजिक हथियार बना दिया। भैंस के दूध से स्किम्ड मिल्क पाउडर बनाने की तकनीक विकसित की, जो विशेषज्ञों के लिए असंभव मानी जाती थी। भारत में भैंस का दूध गाय के दूध से दस गुना अधिक था, लेकिन वसा अलग करना चुनौतीपूर्ण था। सहयोगी एच.एम. दलाई के साथ प्रयोगों से उन्होंने सफलता पाई। इससे अमूल ने नेस्ले जैसी कंपनियों से मुकाबला किया और भारत आयात-निर्भरता से मुक्त हुआ। कुरियन का दर्शन था: "किसान को हाथी की सवारी सिखाओ, ताकि वह खुद को नियंत्रित कर सके।" ऑपरेशन फ्लड, दुनिया का सबसे बड़ा कृषि कार्यक्रम, इसी पर आधारित था। 1970 से 1996 तक इसने 81,000 सहकारी समितियाँ बनाईं, 10 मिलियन से अधिक किसानों को जोड़ा। दूध उत्पादन 1,90,000 टन से बढ़कर 50 लाख टन सालाना हो गया, और भारत दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। दिलचस्प है कि कुरियन को दूध का स्वाद पसंद न था, फिर भी उन्होंने करोड़ों बच्चों को इसका महत्व सिखाया।
अमूल केवल ब्रांड नहीं, विद्रोह का प्रतीक था। कुरियन ने किसानों को मालिक बनाया, वे दूध देने से लेकर प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन तक भागीदार बने। अमूल गर्ल का विज्ञापन अभियान, 50 वर्षों से चल रहा, कुरियन की देन है। यह हास्य से राजनीति पर व्यंग्य करता है, लेकिन हमेशा किसान के पक्ष में। 1962 के भारत-चीन युद्ध में दूध सेना को भेजा गया, तो पोल्सन ने बाजार हथिया लिया। कुरियन ने सरकार से पोल्सन की मशीनें रोकने की अपील की, सहकारिता की रक्षा के लिए। उनकी सबसे बड़ी लड़ाई नौकरशाही से थी। वे कहते: "मैं संकट से भागता नहीं, उसे सींगों से पकड़ता हूँ।" 1990 के दशक में उदारीकरण से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आईं, तो एनडीडीबी से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि उत्तराधिकारी अमृता पटेल विपणन आउटसोर्सिंग पर जोर दे रही थीं, जो किसानों को कमजोर कर सकती थी। बाद के वर्षों में कुरियन नास्तिक हो गए; उनके लिए केवल मानव कल्याण मायने रखता था।
कुरियन की दृष्टि सीमाओं से परे थी। उन्होंने विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे गाँव की धूल-मिट्टी और किसानों के सपनों से जोड़ दिया। इंजीनियर होकर भी उन्होंने मशीनों को किसानों की बोली सिखाई और तकनीक को किसानों की चौपाल तक पहुँचा दिया। बैंगलोर के संस्थान में सीखी गई दूध-परीक्षण की सरल विधियाँ जब गाँव की औरतों के हाथों में पहुँचीं, तो वह विधियाँ केवल तकनीक नहीं रहीं—वह आत्मनिर्भरता और सम्मान का हथियार बन गईं। 1979 में जब आनंद में इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट (आईआरएमए) की नींव रखी गई, तो ग्रामीण प्रबंधन पहली बार कॉर्पोरेट ऊँचाइयों तक पहुँचा।
महिलाओं के सशक्तिकरण में उनका योगदान अद्वितीय रहा—खेड़ा में त्रिभुवनदास फाउंडेशन के जरिए स्वास्थ्य और शिक्षा पर ध्यान दिलाया, और गाँव की महिलाएँ दूध-परीक्षण में विशेषज्ञ बनकर आर्थिक स्वतंत्रता की नई मिसाल बनीं। 1976 में किसानों के केवल दो-दो रुपये से बनी ‘मंथन’ फिल्म ने सहकारिता को परदे से दिलों तक पहुँचा दिया। भैंस के दूध से चीज़ बनाने की तकनीक ने अमूल को वैश्विक मंच पर खड़ा कर दिया, और यह साबित किया कि गाँव की गाय-भैंसें भी दुनिया की अर्थव्यवस्था में भूमिका निभा सकती हैं।
पर सवाल अब भी है, क्या हम कुरियन के सपनों को सँभाल पा रहे हैं? आज दूध उद्योग अरबों का हो चुका है, लेकिन किसान क्या अब भी असली मालिक हैं? जलवायु परिवर्तन की मार से सूखा उत्पादन को प्रभावित कर रहा है, तो क्या हम भैंसों की नस्ल-सुधार और पानी-संरक्षण को सहकारिता से जोड़ पाए हैं? कुरियन ने जीवनभर समझौता नहीं किया। 1998 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को अमृता पटेल को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए राज़ी तो किया, पर मतभेदों ने रिश्तों को तनावपूर्ण बना दिया। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनके मतभेद रहे, और यही उनके सिद्धांतों पर अडिग व्यक्तित्व की गवाही देता है—एक ऐसा व्यक्तित्व जो सच्चाई के साथ खड़ा रहा, चाहे सामने सत्ता क्यों न हो।
कुरियन का जीवन हमें यह अद्भुत सत्य सिखाता है कि क्रांति कभी नारों से नहीं, बल्कि संगठित संकल्प से जन्म लेती है। उन्होंने किसान की टूटी-फूटी झोपड़ी से उठकर एक ऐसा विश्वस्तरीय आंदोलन खड़ा किया, जिसकी गूंज आज भी भारत की नसों में बहते दूध में सुनाई देती है। आत्मनिर्भरता उनके विचारों का मूल था—स्वाभिमान से जीना और अपनी धरती की ताकत को पहचानना ही उनकी पहचान थी।
9 सितंबर को जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि का क्षण नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण का अवसर है—क्या हम वास्तव में उनके साहस और दृष्टि के साथ आगे बढ़ रहे हैं? उनका जाना केवल एक महान व्यक्ति का अंत नहीं था; वह एक युग का अवसान था। पर उनकी विरासत अब भी जीवित है, और उसे नया आयाम देना हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है। उन्होंने साबित किया कि एक अकेले व्यक्ति की दृढ़ता पूरे राष्ट्र की दिशा बदल सकती है। दूध की हर बूंद केवल पोषण नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा है। यदि हम उसे उज्ज्वल और आत्मनिर्भर बनाने का प्रण लें, तो यही हमारी सच्ची प्रतिज्ञा होगी और यही प्रतिज्ञा उनके प्रति सबसे गहरी श्रद्धांजलि होगी।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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