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Dr. Srimati Tara Singh
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त्योहारों का रूपांतरण

 

सादगी से शोर-शराबे तक: त्योहारों का रूपांतरण

[परंपराएँ: जीवन दर्शन से इवेंट मैनेजमेंट तक]

[संस्कृति बनाम सांस्कृतिक प्रदर्शन]



संस्कृति किसी समाज की आत्मा है, उसकी जीवंत धड़कन। यह केवल रीति-रिवाज, त्योहार या परंपराओं का बाहरी आवरण नहीं, बल्कि वह गहरा दर्शन है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है, जीवन को अर्थ और गहराई देता है। त्योहार, धर्म और परंपराएँ कभी केवल उत्सव नहीं थे; वे संवेदनाओं को जगाने, सामूहिकता को मजबूत करने और आत्मिक संतुलन स्थापित करने का माध्यम थे। लेकिन आज, इनकी आत्मा कहीं खो सी गई है। त्योहार अब ‘इवेंट’ बनकर रह गए हैं, जहाँ भक्ति और भावनाएँ पीछे छूटती हैं, और चमक-दमक, शोर-शराबा व दिखावा हावी हो जाता है। यह बदलाव न केवल हमारे सामाजिक व्यवहार को दर्शाता है, बल्कि हमारी संस्कृति की गहराई पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है।

पहले त्योहार सादगी में सौंदर्य और सामूहिकता में आनंद का प्रतीक थे। दीपावली में घर-आँगन की सफाई, मिट्टी के दीयों की जगमगाहट, माँ के हाथों की मिठाइयाँ और पड़ोसियों के साथ साझा हँसी—ये रस्में नहीं, बल्कि जीवन को प्रेम और एकजुटता से जीने का तरीका थीं। गणेशोत्सव में मोहल्ले के लोग मिलकर मूर्ति बनाते, भक्ति और उत्साह के साथ विसर्जन तक एकजुट रहते। नवरात्रि में मातृशक्ति की आराधना केवल पूजा नहीं थी; यह नारी सम्मान और सामाजिक एकता का उत्सव थी। ये त्योहार समाज को जोड़ने वाली डोर थे, जो आत्मिक और सामाजिक संतुलन का आधार बनाते थे।

लेकिन अब यह तस्वीर बदल चुकी है। दीपावली की रोशनी अब मिट्टी के दीयों से कम, महंगी एलईडी लाइट्स और आडंबरपूर्ण सजावट से ज्यादा चमकती है। घर की सादगी भरी पूजा थीम-बेस्ड पंडालों, डिज़ाइनर दीयों और भव्य शो-पीस की चमक में गुम हो गई है। गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा जैसे पवित्र आयोजन अब भक्ति से ज्यादा डीजे, लाउडस्पीकर और सामाजिक प्रतिष्ठा की होड़ का हिस्सा बन गए हैं। नवरात्रि, जो कभी मातृशक्ति की भक्ति और सामूहिक नृत्य का प्रतीक थी, अब टिकटों, प्रायोजकों और ‘गरबा नाइट्स’ के व्यावसायिक आयोजनों में सिमट रही है। यहाँ तक कि होली जैसे रंगों का त्योहार भी अब ‘रेन डांस’ और ‘पूल पार्टी’ जैसे आयोजनों में अपनी परंपरागत पहचान खो रहा है। क्या यह बदलाव समय की माँग है, या हम अपनी संस्कृति को सतही चमक में खोते जा रहे हैं?

सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है। त्योहार अब केवल परिवार के साथ आनंद लेने का अवसर नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर/एक्स और टिकटॉक पर प्रदर्शन का मंच बन गए हैं। पूजा से पहले लोग कैमरे की सेटिंग देखते हैं, ताकि ‘परफेक्ट शॉट’ मिले। सजावट, परिधान, यहाँ तक कि पूजा की थाली भी अब सोशल मीडिया पर ‘लाइक्स’ बटोरने की कसौटी पर चुनी जाती है। त्योहारों की आत्मा अब ‘कंटेंट क्रिएशन’ में तब्दील हो रही है। लोग दीपावली की तस्वीरें अपलोड करते हैं, गणेशोत्सव की स्टोरीज बनाते हैं, और नवरात्रि के गरबा वीडियो वायरल करने की होड़ में लगे रहते हैं। यह दिखावा अब व्यक्तिगत ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी हावी है। भव्य पंडाल, प्रायोजित ‘सांस्कृतिक’ शो और बड़े-बड़े आयोजन अब श्रद्धा से ज्यादा सामाजिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुके हैं।

यह सब देखकर मन में एक गहरा सवाल उठता है—क्या हम अपनी संस्कृति को केवल एक चमकदार ‘प्रदर्शन’ तक सीमित कर रहे हैं? परंपराओं का बदलना कोई अपराध नहीं। हर युग अपने रंग-ढंग लाता है। लेकिन जब ये बदलाव श्रद्धा, भावना और आत्मिक गहराई को पीछे छोड़ दें, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। संस्कृति कोई सजावटी वस्तु नहीं; यह वह जीवंत धड़कन है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, हमारे अस्तित्व को अर्थ देती है। यदि हम इसे केवल भव्यता और दिखावे तक सीमित कर देंगे, तो उसकी आत्मा खो जाएगी।

इस दिखावे की होड़ का एक और गंभीर पहलू है—यह सामान्य व्यक्ति पर अनावश्यक दबाव डाल रही है। हर कोई चाहता है कि उसका त्योहार ‘ट्रेंडी’ और ‘इंस्टा-वर्थी’ हो। इसके लिए लोग अपनी आर्थिक स्थिति से परे खर्च करने को मजबूर हैं। महँगे कपड़े, थीम-बेस्ड सजावट और भव्य आयोजनों की चाह में कई कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं। यह दबाव केवल आर्थिक ही नहीं, मानसिक भी है। त्योहारों का असली आनंद—जो सादगी और साझा भावनाओं में बसता था—अब ‘इम्प्रेशन’ और ‘इंस्टेंट लाइक्स’ की दौड़ में गुम हो रहा है।

हालाँकि, यह कहना गलत होगा कि आधुनिकता या भव्य आयोजनों का कोई लाभ नहीं। बड़े आयोजन सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देते हैं, स्थानीय कारीगरों और व्यवसायों को अवसर देते हैं, और कला-संस्कृति को नए मंच प्रदान करते हैं। लेकिन जब ये आयोजन भक्ति और भावना की जगह ले लेते हैं, तब संतुलन बिगड़ जाता है। जब पूजा की गहराई खो जाए और केवल पंडाल की भव्यता बाकी रह जाए, तब संस्कृति एक खोखला प्रदर्शन बनकर रह जाती है।

हमें यह समझना होगा कि संस्कृति कोई मंचीय नाटक नहीं; यह वह जीवंत अनुभूति है, जो हमारे दिलों में बसती है। इसे आधुनिकता के साथ जोड़ा जा सकता है, बशर्ते हम उसकी आत्मा को न भूलें। अगर हम दीपावली पर एलईडी लाइट्स जलाते हैं, तो मिट्टी के दीयों की लौ को भी जिंदा रखें। अगर हम गरबा नाइट्स में शामिल होते हैं, तो उसे केवल डांस पार्टी न बनाएँ, बल्कि भक्ति और सामूहिक आनंद का उत्सव बनाएँ। अगर हम सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हैं, तो उनका उद्देश्य केवल दिखावा न हो, बल्कि संस्कृति को प्रेम और सम्मान के साथ दुनिया तक पहुँचाना हो।

संस्कृति तभी सजीव रहती है, जब उसे दिल से जिया जाए। अगर वह केवल मंच, सजावट और शोर तक सिमट जाए, तो उसका असली मोल खो जाएगा। त्योहार हमें जोड़ने के लिए हैं, न कि प्रतिस्पर्धा की आग में झोंकने के लिए। वे हमारे भीतर की रोशनी जगाने के लिए हैं, न कि केवल बाहरी चमक दिखाने के लिए। आज हमें संस्कृति और ‘सांस्कृतिक प्रदर्शन’ के बीच का अंतर समझना होगा। हमें तय करना होगा कि हम त्योहारों को जीते हैं या उन्हें केवल ‘इवेंट’ की तरह पेश करते हैं। यह चुनाव न केवल हमारी संस्कृति को परिभाषित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी दिखाएगा कि संस्कृति का असली मतलब क्या है—एक जीवंत अनुभूति या मात्र एक खोखला प्रदर्शन।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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