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Dr. Srimati Tara Singh
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21 की उम्र में संसद

 

21 की उम्र में संसद: क्या यही है सही समय?

[लोकतंत्र में ताजगी: क्यों ज़रूरी है युवा नेतृत्व]

भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, अपनी जीवंतता और विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इसकी नींव में युवा शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान है, जो सामाजिक परिवर्तन का वाहक होने के साथ-साथ भविष्य को आकार देने में भी सक्षम है। एक क्रांतिकारी प्रस्ताव वर्तमान में चर्चा में है—चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष से घटाकर 21 वर्ष करना। यह कदम न केवल लोकतांत्रिक भागीदारी को व्यापक बनाएगा, बल्कि युवाओं को नेतृत्व की मुख्यधारा में लाने का एक सशक्त अवसर भी प्रदान करेगा।

वर्तमान में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 84 और 173 के अनुसार, लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष है, जबकि 1989 के 61वें संविधान संशोधन द्वारा मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई थी। यह बदलाव युवाओं की बढ़ती जागरूकता और उनकी लोकतांत्रिक सहभागिता को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया था। आज, जब भारत की 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है (2021 जनगणना अनुमान), यह सवाल प्रासंगिक है: क्या 21 वर्ष की आयु में युवा केवल मतदान तक सीमित रहें, या उन्हें नीति-निर्माण में भी भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए?

युवा नेतृत्व को बढ़ावा देना आज की आवश्यकता है। डिजिटल युग में पला-बढ़ा भारतीय युवा तकनीकी नवाचारों, वैश्विक दृष्टिकोण और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों की गहरी समझ रखता है। उदाहरणस्वरूप, 2019 के लोकसभा चुनाव में 18-25 आयु वर्ग के लगभग 15 करोड़ मतदाताओं ने सक्रिय भागीदारी दिखाई, जो कुल मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा है। फिर भी, संसद में 25-35 आयु वर्ग के सांसदों की संख्या केवल 12% थी (पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, 2019)। यह असंतुलन दर्शाता है कि युवा मतदान में तो सक्रिय हैं, लेकिन नेतृत्व और नीति-निर्माण में उनकी उपस्थिति सीमित है।

चुनाव लड़ने की आयु 21 वर्ष करने से यह असमानता कम हो सकती है। युवा नेता शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण, और तकनीकी नवाचार जैसे क्षेत्रों में नवीन दृष्टिकोण ला सकते हैं। वैश्विक उदाहरण के तौर पर, न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने 37 वर्ष की आयु में 2017 में सत्ता संभालकर युवा नेतृत्व की शक्ति का प्रदर्शन किया। उनकी जलवायु परिवर्तन और सामाजिक समावेशन की नीतियों ने विश्वव्यापी प्रशंसा प्राप्त की। भारत में भी, सचिन पायलट और तेजस्वी यादव जैसे युवा नेताओं ने अपनी क्षमता सिद्ध की है, किंतु आयु सीमा के कारण कई अन्य प्रतिभाशाली युवा नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं।

चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 से घटाकर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव भारत के लोकतंत्र को अधिक समावेशी और गतिशील बनाने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम हो सकता है। इसके पक्ष में कई ठोस तर्क हैं। पहला, यदि 18 वर्ष की आयु में कोई व्यक्ति मतदान के लिए पर्याप्त परिपक्व माना जाता है, तो 21 वर्ष की आयु में वह नीति-निर्माण और नेतृत्व के लिए भी सक्षम हो सकता है। यह बदलाव युवाओं को केवल मतदाता तक सीमित न रखकर उन्हें सक्रिय निर्णय-निर्माता की भूमिका में लाएगा। दूसरा, युवा नेतृत्व ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में नवीन विचारों और समाधानों को बढ़ावा देगा। उदाहरण के लिए, स्टूडेंट यूनियन चुनावों में 18-22 वर्ष के युवा अपनी संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व कौशल का प्रदर्शन करते हैं। राष्ट्रीय मंच पर अवसर मिलने पर वे बड़े पैमाने पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

तीसरा, यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति में वंशवाद और पुरानी पीढ़ी के प्रभुत्व को चुनौती देगा। देश में राजनीति अक्सर कुछ परिवारों और पुराने चेहरों तक सीमित रहती है। कम आयु में उम्मीदवारी की अनुमति से नई प्रतिभाएं उभरेंगी, जिससे राजनीति में ताजगी और विविधता आएगी। साथ ही, डिजिटल युग का युवा सोशल मीडिया और तकनीक के माध्यम से मतदाताओं से सीधे जुड़ सकता है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में डिजिटल प्रचार की प्रभावशाली भूमिका इसका प्रमाण है।

विपक्षी तर्कों में कहा जा सकता है कि 21 वर्ष की आयु में व्यक्ति में पर्याप्त अनुभव या परिपक्वता की कमी हो सकती है। हालांकि, यह तर्क कमजोर पड़ता है जब हम देखते हैं कि आज के युवा 21 वर्ष की आयु में स्टार्टअप्स, सामाजिक आंदोलन और वैश्विक मंचों पर नेतृत्व कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, मलाला यूसुफजई ने 17 वर्ष की आयु में नोबेल शांति पुरस्कार जीतकर वैश्विक प्रभाव डाला। दूसरा तर्क यह है कि कम आयु के उम्मीदवारों से राजनीति में अस्थिरता बढ़ सकती है। किंतु यह तर्क भी तथ्यपरक नहीं, क्योंकि नेतृत्व की क्षमता आयु से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण, कार्यक्षमता और समर्पण से निर्धारित होती है।

इस प्रस्ताव का कार्यान्वयन भारत के लोकतंत्र को और जीवंत बनाएगा। यह न केवल युवा नेतृत्व को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि मतदाताओं में भी उत्साह जगाएगा। सीएसडीएस – लोकनीति के 2019 के सर्वेक्षण के अनुसार, 60% से अधिक युवा मतदाता चाहते हैं कि उनकी आयु वर्ग के लोग संसद में उनकी आवाज बनें। इस बदलाव के लिए संवैधानिक संशोधन आवश्यक होगा, जिसमें संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और आधे से अधिक राज्यों की सहमति चाहिए। यह प्रक्रिया जटिल है, लेकिन 1989 में मतदान आयु घटाने का सफल उदाहरण इसे संभव बनाता है।

इसके अतिरिक्त, इस परिवर्तन को प्रभावी बनाने के लिए व्यापक सामाजिक जागरूकता और युवाओं के लिए लक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता होगी। गैर-सरकारी संगठन, शैक्षिक संस्थान और नागरिक समाज मिलकर युवाओं को राजनीतिक प्रक्रियाओं, नीति-निर्माण और प्रभावी नेतृत्व के लिए तैयार कर सकते हैं। कार्यशालाओं, प्रशिक्षण शिविरों और मेंटरशिप कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को संसदीय कार्यप्रणाली, कानून निर्माण और जनसंपर्क जैसे कौशलों में निपुण किया जा सकता है। साथ ही, निर्वाचन आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, ताकि कम आयु के उम्मीदवारों के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी और समावेशी प्रक्रिया सुनिश्चित हो। विशेष रूप से, ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों के युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए लक्षित पहल की आवश्यकता होगी, ताकि अवसरों की समानता बनी रहे।

चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 से घटाकर 21 वर्ष करना भारत के लोकतंत्र को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करेगा। यह कदम युवाओं को केवल मतदाता की भूमिका तक सीमित न रखकर उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में लाएगा। विश्वसनीय आंकड़ों और उदाहरणों से स्पष्ट है कि आज का युवा न केवल सक्षम है, बल्कि परिवर्तन का सशक्त वाहक भी है। उदाहरण के लिए, जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने 15 वर्ष की आयु से वैश्विक पर्यावरण आंदोलन को प्रेरित किया, और भारत में भी युवा सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर सक्रियता दिखा रहे हैं। यह प्रस्ताव न केवल लोकतांत्रिक भागीदारी को गहरा करेगा, बल्कि भारत को एक अधिक गतिशील, समावेशी और प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा। 

अब समय है कि हम अपनी युवा शक्ति को वह मंच प्रदान करें, जिसका वे वास्तव में हकदार हैं। यह बदलाव न केवल युवाओं के सपनों को उड़ान देगा, बल्कि भारत के लोकतंत्र को एक नए युग की ओर ले जाएगा, जहां नवाचार, उत्साह और समर्पण राष्ट्र निर्माण का आधार बनेंगे।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)



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