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तस्करों का देश नहीं है भारत—फिर बच्चे क्यों गायब हैं?

 

तस्करों का देश नहीं है भारत—फिर बच्चे क्यों गायब हैं?

[गुमशुदा बच्चे, जिंदा ज़मीर: व्यवस्था के चेहरे पर तमाचा]

[गरीबी से अस्पताल तक: बाल तस्करी का फैलता नेटवर्क]


·       प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


19 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने बाल तस्करी और बच्चों के वाणिज्यिक यौन शोषण को भारत की एक "गहराई से परेशान करने वाली वास्तविकता" बताते हुए कठोर टिप्पणी की। यह फैसला साफ संकेत देता है कि कड़े कानूनों के बावजूद ये अपराध इसलिए पनप रहे हैं, क्योंकि वे इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं, बल्कि संगठित और सुनियोजित कार्टेलों का हिस्सा हैं। अदालत ने पीड़ित बच्चों की गवाही को विश्वसनीय ढंग से परखने के लिए अहम दिशानिर्देश जारी किए—छोटी-मोटी असंगतियों के आधार पर बयान खारिज न करने और यौन शोषण की स्मृतियों को बार-बार कुरेदने से पैदा होने वाली द्वितीयक पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहने पर विशेष जोर दिया। यदि इन निर्देशों का जमीनी स्तर पर ईमानदारी से पालन हो, तो बाल तस्करी के खिलाफ संघर्ष को वास्तविक मजबूती मिल सकती है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2023 के आंकड़े इस संकट की भयावहता को और उजागर करते हैं। वर्ष 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराधों के 1,77,335 मामले दर्ज हुए, जो 2022 की तुलना में 9.2% अधिक हैं। इनमें अपहरण और तस्करी की घटनाएं सबसे आगे हैं। मानव तस्करी के कुल 2,183 मामलों में अधिकांश पीड़ित बच्चे ही हैं। हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो रहा है, और लाखों ऐसे हैं जो कभी वापस नहीं मिलते। कोविड-19 महामारी के बाद हालात और बिगड़े हैं—कुछ इलाकों में तस्करी के मामलों में 68% तक की वृद्धि दर्ज हुई, कई राज्यों में अपहरण के मामले दोगुने से भी अधिक हो गए। गरीबी और सीमाओं की निकटता तस्करों के लिए रास्ते आसान बनाती है, और बच्चों के लिए खतरे कहीं अधिक गहरे हो जाते हैं।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस भयावह संकट के केंद्र में हैं। यहां अपहरण के हजारों मामले दर्ज होते हैं और कोविड के बाद बाल तस्करी में तेज उछाल देखा गया है। अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों से नवजात शिशुओं की तस्करी पर कड़ा रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में संबंधित अस्पताल का लाइसेंस तत्काल निलंबित किया जाए। अदालत ने बाल तस्करी से जुड़े मुकदमों का निपटारा छह माह के भीतर करने का आदेश भी दिया। यह सख्ती इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि अस्पताल, जो जीवन के रक्षक होने चाहिए, अब कई जगह तस्करी के संगठित अड्डों में बदलते जा रहे हैं, जहां मिलीभगत के संकेत भी सामने आते हैं।

इस अपराध की जड़ें गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं में धंसी हुई हैं। गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा परिवारों को बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर करती है, और वहीं तस्कर उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चे सबसे अधिक खतरे में हैं। कानूनों का कमजोर और असंगत क्रियान्वयन तस्करों को संरक्षण देता है। तकनीक का दुरुपयोग बढ़ा है—ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए बच्चों को बहकाया जाता है। अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस अड्डे कार्टेल के प्रमुख ठिकाने बन चुके हैं, जबकि राजनीतिक गठजोड़ और कानूनी पेचीदगियां जांच की राह में दीवार खड़ी करती हैं। केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से अब तक हजारों बच्चे लापता हैं, जिनमें बड़ी संख्या तस्करी का शिकार है।

भारत में बाल तस्करी रोकने के लिए सशक्त कानूनी ढांचा मौजूद है। संविधान का अनुच्छेद 23 मानव तस्करी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। भारतीय दंड संहिता, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956, पॉस्को एक्ट, बाल संरक्षण अधिनियम 2012 और किशोर न्याय अधिनियम 2000 जैसे कानून इस अपराध से निपटने के लिए पर्याप्त प्रावधान करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसलों में पीड़ितों की गवाही के संवेदनशील मूल्यांकन के स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं। वर्ष 2025 में पॉस्को मामलों के निपटान में उल्लेखनीय सुधार दिखा—87,754 मामलों का निस्तारण हुआ, जबकि 80,320 नए मामले दर्ज हुए—फिर भी लंबित प्रकरण और कम दोषसिद्धि दर बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

समाज पर इसका प्रभाव केवल गंभीर नहीं, बल्कि पूरी तरह विनाशकारी है। तस्करी के शिकार बच्चे शारीरिक यातनाओं और गहरे मानसिक आघात के साथ जीने को मजबूर होते हैं, जिनके घाव समय के साथ अपराध, हिंसा और असामाजिक व्यवहार की नई श्रृंखलाओं में बदल जाते हैं। यौन शोषण न केवल व्यक्तिगत जीवन को तोड़ देता है, बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट और सामाजिक असुरक्षा को भी जन्म देता है। वहीं बाल श्रम मानव संसाधन को कुंद कर अर्थव्यवस्था को भीतर ही भीतर खोखला करता है। जब लाखों बच्चे इस अंधे और निर्दय जाल में फंसे हों, तब किसी भी राष्ट्र की विकास-गति का रुक जाना नहीं, बल्कि उसका भटक जाना तय हो जाता है।

समाधान के लिए एक सुसंगठित और बहुआयामी रणनीति अनिवार्य है। पुलिस बल को विशेष प्रशिक्षण के साथ एआई-आधारित ट्रैकिंग और विश्लेषण प्रणाली से लैस किया जाए। अस्पतालों में कड़ी निगरानी व्यवस्था को बाध्यकारी बनाया जाए। शिक्षा और व्यापक जन-जागरूकता अभियानों को तेज किया जाए, जिनमें गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका और प्रभाव दोनों बढ़ें। फास्ट-ट्रैक अदालतों की संख्या बढ़ाकर मामलों का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित किया जाए। राज्यों में समर्पित नोडल अधिकारियों की नियुक्ति हो और लंबित प्रकरणों को विशेष इकाइयों के हवाले किया जाए। समाज की सतर्कता भी निर्णायक होगी—पड़ोसी, शिक्षक और जिम्मेदार नागरिक संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्टिंग में सक्रिय भागीदार बनें। तकनीक के सकारात्मक और रणनीतिक उपयोग से तस्करों के नेटवर्क को जड़ से तोड़ा जाए।

सुप्रीम कोर्ट की हालिया सख्ती एक दोटूक चेतावनी है कि बाल तस्करी अब किसी भी रूप में सहन नहीं की जाएगी। पर वास्तविक और स्थायी बदलाव तभी आएगा, जब कानूनों का कठोर व निष्पक्ष क्रियान्वयन, प्रशासन की संवेदनशील तत्परता और समाज की सक्रिय भागीदारी एक साथ कदम बढ़ाएं। हर लापता बच्चा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी और नैतिक परीक्षा है। यदि आज निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, तो तस्करी के कार्टेल और अधिक संगठित व शक्तिशाली होते जाएंगे। इसलिए यह समय आधे उपायों का नहीं, बल्कि इस अंधेरे को जड़ से खत्म करने के दृढ़ संकल्प का है, ताकि हर बच्चे का बचपन सुरक्षित, गरिमामय और भय से मुक्त हो सके।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

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बी-87, महावीर नगर, बड़वानी (मप्र) – 451 551

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