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Dr. Srimati Tara Singh
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तकनीक और ममता के बीच पुल बनते माता-पिता

 

पैरेंटिंग 2.0: तकनीक और ममता के बीच पुल बनते माता-पिता

[डिजिटल चुनौतियों में घिरा बचपन: पथ-प्रदर्शक बनते अभिभावक]


जब एक बच्चे की मासूम आँखों में दुनिया की पहली किरण झलकती है, तो उसकी नजरें माता-पिता का चेहरा नहीं, बल्कि उनके अथाह प्यार, उनकी गर्माहट और उनकी अनंत उम्मीदों का सागर देखती हैं। यह वह पल है, जब एक नन्हा दिल धड़कना शुरू करता है, और माता-पिता का हर शब्द, हर स्पर्श, उस कोरे मन की किताब पर अमिट स्याही बनकर उतरता है। लेकिन आज का दौर वह नहीं, जहाँ केवल लोरियों की मिठास या परियों की कहानियों का जादू बच्चे का भविष्य संवार सकता है। यह युग डिजिटल चमक, सूचनाओं के तूफान और जटिल रिश्तों का है। यहाँ पेरेंटिंग अब सिर्फ़ पालन-पोषण नहीं, बल्कि एक ऐसी कला है, जो बच्चों को तकनीक की चकाचौंध और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन का पाठ पढ़ाती है। यह एक अनमोल सफ़र है, जहाँ माता-पिता न केवल मार्गदर्शक, बल्कि सहयात्री बनकर बच्चों के साथ कदम मिलाते हैं—सीखते, समझते और एक नई दुनिया को गढ़ते हुए।

आज के बच्चे डिजिटल युग के सच्चे सिपाही हैं, जिनका जन्म ही स्क्रीनों की चमक और सूचनाओं के सैलाब के बीच हुआ है। यूनिसेफ इंडिया (2023) के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 6-14 वर्ष के 71% बच्चे रोज़ाना स्मार्टफोन से जुड़े रहते हैं, औसतन 3-4 घंटे स्क्रीन की दुनिया में खोए रहते हैं। यूट्यूब उनकी पाठशाला है, सोशल मीडिया उनका मंच, और वर्चुअल दुनिया उनकी पहचान का आईना। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे छुपा है एक अदृश्य खतरा—साइबरबुलिंग, ऑनलाइन शोषण, और स्क्रीन की लत का जाल। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन (एनसीबीआई, 2024) के शोध के अनुसार, 10-18 वर्ष के 28% किशोरों ने ऑनलाइन उत्पीड़न का दंश झेला है, और 35% स्क्रीन की अतिशयता से तनाव और चिंता के शिकार हुए हैं। ऐसे में माता-पिता की भूमिका अब केवल नियमों की चौकीदारी तक सीमित नहीं। उन्हें एक भावनात्मक पथप्रदर्शक बनना है—जो स्क्रीन की ठंडी चमक के पीछे छुपे बच्चे के डर, असुरक्षा और अनकहे सपनों को न केवल समझे, बल्कि उनके साथ कदम से कदम मिलाकर एक सुरक्षित और प्रेरणादायक भविष्य का निर्माण करे।

पेरेंटिंग अब आदेशों का शोर नहीं, बल्कि संवाद का सौम्य संगीत है। वह दौर लद गया, जब डाँट और नसीहत से बच्चे का रास्ता बन जाता था। आज का बच्चा भरोसे की गर्माहट और खुले दिल की तलाश में है। प्यू रिसर्च सेंटर (2024) के एक सर्वे में 62% किशोरों ने खुलासा किया कि वे अपने माता-पिता के साथ दिल खोलकर बात करना चाहते हैं, मगर केवल 29% को लगता है कि उनकी भावनाओं को सही मायने में समझा जाता है। यह आँकड़ा एक गहरी सच्चाई को उघाड़ता है—बच्चों को सुनने और समझने की ज़रूरत अब पहले से कहीं ज़्यादा है। माता-पिता को हर सवाल का जवाब थोपने के बजाय, बच्चों को सवाल उठाने की हिम्मत देनी होगी। उदाहरण के लिए, अगर बच्चा सोशल मीडिया के किसी ट्रेंड के पीछे भागना चाहता है, तो उसे डाँटने के बजाय, प्यार से समझाना होगा कि वह ट्रेंड क्यों भटकाने वाला हो सकता है। यह प्रक्रिया न सिर्फ़ बच्चे की तार्किक सोच को जागृत करती है, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी आसमान की ऊँचाइयों तक उड़ान देती है।

डिजिटल साक्षरता अब पेरेंटिंग का अभिन्न अंग है, एक ऐसी कला जो आज के युग में अपरिहार्य है। बच्चे एआई से सवाल पूछते हैं, गेमिंग प्लेटफॉर्म पर दोस्त बनाते हैं, और ऑनलाइन अपनी पहचान की तलाश में भटकते हैं। मगर इस चमकती वर्चुअल दुनिया में वे अक्सर अकेलेपन, तुलना के दबाव, और आत्मसम्मान की चुनौतियों के भँवर में फँस जाते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (2023) के एक अध्ययन ने खुलासा किया कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से किशोरों में आत्मसम्मान 20% तक घट जाता है। ऐसे में माता-पिता को बच्चों को न केवल डिजिटल साक्षरता, बल्कि भावनात्मक परिपक्वता का पाठ भी पढ़ाना होगा। इसका अर्थ है—ऑनलाइन सामग्री की सत्यता को परखना, साइबर सुरक्षा के गुर सिखाना, और स्क्रीन टाइम का संतुलन बनाना। माता-पिता को बच्चों की ऑनलाइन दुनिया में सहयात्री बनना होगा, खुली चर्चा के ज़रिए उनके अनुभवों को समझना होगा। मिसाल के तौर पर, अगर बच्चा यूट्यूब पर कोई वीडियो देख रहा है, तो माता-पिता उस कंटेंट पर बात शुरू कर सकते हैं, यह पूछते हुए कि उसने उससे क्या सीखा। यह न सिर्फ़ बच्चे की आलोचनात्मक सोच को निखारता है, बल्कि माता-पिता के साथ उनके रिश्ते को भी अटूट विश्वास की डोर से बाँधता है।

आज के माता-पिता को एक सखा की तरह होना होगा—वह साथी, जो बच्चे को न केवल चलना सिखाए, बल्कि गिरकर उठने का साहस भी दे। उन्हें हर सवाल का जवाब थोपने के बजाय, सही सवाल पूछने की कला सिखानी होगी। पेरेंटिंग अब महज़ मार्गदर्शन नहीं, बल्कि एक जीवंत संवाद है, जहाँ माता-पिता और बच्चा कंधे से कंधा मिलाकर सीखते हैं—तकनीक की रफ्तार को गले लगाते हुए, संवेदनाओं की गर्माहट को सहेजते हुए, और भविष्य को सुनहरे सपनों से संवारते हुए। ऐसे युग में, जहाँ बच्चे एक कमरे में बैठकर हजारों लोगों से जुड़ सकते हैं, यह अनिवार्य है कि वे अपने माता-पिता के साथ भावनात्मक बंधन में बंधे रहें। क्योंकि अगर माता-पिता ने उन्हें समय, समझ, और प्यार की छाँव नहीं दी, तो दुनिया का तूफान उन्हें भटकाने को तैयार बैठा है।

आज के माता-पिता को अपनी भूमिका को नए सिरे से गढ़ना होगा। वे अब केवल पालनकर्ता नहीं, बल्कि प्रेरणा के स्रोत, मार्गदर्शक और डिजिटल युग के जीवन गुरु हैं। उन्हें बच्चों को न सिर्फ़ ज्ञान की रोशनी देनी है, बल्कि संवेदना, सहिष्णुता और आत्मनियंत्रण जैसे अमूल्य रत्न भी सौंपने हैं। जब बच्चे की आँखों में यह अटूट विश्वास चमकेगा कि “मेरे माता-पिता मेरे साथ हैं, मेरे दिल को समझते हैं, और हर तूफान में मेरी ढाल हैं,” तभी हम गर्व से कह सकेंगे कि हमने न केवल एक बेहतर इंसान, बल्कि एक उज्ज्वल, मानवीय युग का निर्माण किया है।


प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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