सिस्टम की मिट्टी ढीली क्यों? सबरीमाला से दिल्ली तक उठे सवाल
[सुरक्षा के नाम पर कागज़ी किले—अब कार्रवाई नहीं, जवाबदेही चाहिए]
[सबरीमाला से उठी करुण पुकार — कब जागेगा भारत का सुरक्षा तंत्र?]
22 अक्टूबर 2025 की वह रोमांचक सुबह—केरल के पर्वतीय हृदय में, जहां भगवान अय्यप्पा की भक्ति का सागर उफान मार रहा था, सबरीमाला के नवनिर्मित हेलिपैड पर हेलीकॉप्टर की गर्जना ने सबका ध्यान खींच लिया। लाखों श्रद्धालु मंडला पूजा के जयकारों में डूबे थे, अचानक सन्नाटा छा गया। देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का हेलीकॉप्टर, कोच्चि से उड़ान भरकर पहुंचा ही था कि नरम मिट्टी ने उसके पहियों को लील लिया—विमान झुक गया, और राष्ट्र का हृदय थम सा गया। मात्र दस मिनट की वीरतापूर्ण जंग में—नंगे हाथों सैनिकों, एसपीजी कमांडो आदि ने राष्ट्रपति को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। ओडिशा के मयूरभंज की साधारण आदिवासी बेटी विजयी मुस्कान के साथ भूमि पर खड़ी हो गईं, लेकिन यह दुर्घटना सुरक्षा व्यवस्था का काला आईना बन गई—लापरवाही की गहरी चोट, जो पूरे राष्ट्र को चीर गई। भक्ति के पवित्र केंद्र पर मौत का साया? क्या हमारी प्रणाली इतनी नाजुक हो चुकी? यह सवाल केरल की घाटियों से दिल्ली की संसद तक, हर भारतीय के सीने में धड़क रहा है।
कल्पना कीजिए उस नाटकीय पल की—सुबह नौ बजकर पांच मिनट, जब भारतीय वायुसेना का एमआई-17 हेलीकॉप्टर प्रामाडम के राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम हेलिपैड पर उतरा। राष्ट्रपति का शेड्यूल कड़ा था—11:50 बजे तक पंबा पहुंचकर भगवान अय्यप्पा के दर्शन और मंडला पूजा में भागीदारी। लेकिन लैंडिंग के ठीक बाद, रातोंरात बनी नई कंक्रीट सतह ने धोखा दिया। हेलीकॉप्टर का गियर गड्ढे खोद गया, रोटर गरजते रहे, और विमान झुक गया। तनाव भरा दृश्य था—राष्ट्रपति का चेहरा संयमित, लेकिन चारों ओर हलचल। एसपीजी कमांडो, स्थानीय पुलिस, फायर डिपार्टमेंट आदि ने कंधे से कंधा मिलाकर फौरन कार्रवाई की। कुछ ही मिनटों की साहसिक मशक्कत से राष्ट्रपति को सुरक्षित बाहर निकाला गया। बाहर आते ही उन्होंने कहा—भगवान अय्यप्पा की कृपा और सभी योद्धाओं की वीरता से हम बच गए। यह शब्द चुनौतियों पर विजय का प्रेरक संदेश हैं। दर्शन में मामूली देरी हुई, मगर राष्ट्र का विश्वास और अटल हो गया। 2018 के सबरीमाला विवाद के बाद यह पहला राष्ट्रपति दौरा था—सुरक्षा पर विशेष नजर, फिर भी यह विफलता क्यों?
इस हादसे की जड़ें हमारी सुरक्षा व्यवस्था की भयावह लापरवाही में निहित हैं, जो वर्षों से जमी हुई हैं। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के 2021 दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं—हर हेलिपैड का निर्माण मिट्टी परीक्षण से शुरू होता है, जियोटेक्निकल सर्वे अनिवार्य है, और भार क्षमता कम से कम 15 टन होनी चाहिए। राष्ट्रपति जैसे वीआईपी के लिए 48 घंटे पूर्व साइट इंस्पेक्शन, मौसम चेतावनी तथा मॉक ड्रिल अनिवार्य हैं। लेकिन सबरीमाला में ठीक क्या हुआ? 2024 मानसून के बाद बना यह 'अस्थायी' हेलिपैड वास्तव में पूरी तरह अनियमित साबित हुआ। मिट्टी परीक्षण में एसपीटी-एन वैल्यू महज 8-10 मिली, जबकि मानक 20 से ऊपर होना चाहिए था। स्लैब की मोटाई मात्र 4 इंच थी, जबकि 12 इंच अनिवार्य है। लोड क्षमता सिर्फ 6 टन रही, जबकि 15 टन मानक है। मॉक ड्रिल? बिल्कुल शून्य। यह लापरवाही केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवंत सत्य है। पिछले 5 वर्षों में भारत में वीआईपी हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं चिंताजनक रूप से बढ़ी हैं—जैसे 2021 में सीडीएस बिपिन रावत का हादसा और 2025 में उत्तराखंड के तीर्थयात्रा मार्गों पर हुई कई घटनाएं। कैग की 2024 रिपोर्ट्स सरकारी फंडों के दुरुपयोग पर चिंता जताती हैं। यह सिस्टम की नाकामी नहीं, बल्कि जवाबदेही की पूर्ण कमी है, जो राष्ट्रपति जैसी महान शख्सियत की जान को दांव पर लगा देती है।
द्रौपदी मुर्मू का जीवन इस हादसे को और भी मार्मिक बना देता है। 1958 में ओडिशा के संथाल आदिवासी परिवार में जन्मीं, उन्होंने गरीबी में पांच किलोमीटर पैदल स्कूल जाकर शिक्षा हासिल की। जूनियर असिस्टेंट और शिक्षिका से लेकर विधायक, झारखंड की राज्यपाल, और 2022 में भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति तक का उनका सफर प्रेरणादायक है। संथाली सहित कई आदिवासी भाषाओं में पारंगत, लेकिन हिंदी-अंग्रेजी में भी धाराप्रवाह। उनका संघर्ष भारत की मिट्टी का प्रतीक है—गरीबी से शिखर तक। इस हादसे में उनका संयम देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्होंने न केवल खुद को संभाला, बल्कि तुरंत सुधार की मांग की। लेकिन विडंबना देखिए—जिन आदिवासियों के लिए उन्होंने जीवन भर लड़ाई लड़ी, वही सिस्टम ने उनका धोखा दिया। यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई का हिस्सा है। राष्ट्रपति मुर्मू की तरह, भारत की करोड़ों महिलाएं और आदिवासी आज भी असुरक्षित हैं। उनका साहस हमें सिखाता है कि संकट में शांति रखनी है, लेकिन सुधार के लिए जिद करनी है।
इस हादसे ने राष्ट्रीय स्तर पर तूफान ला दिया। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और डीजीसीए ने 22 अक्टूबर 2025 को सभी 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों को हेलिपैड ऑडिट का आदेश जारी किया, जिसमें 15 नवंबर 2025 तक ऑडिट पूरा करने की डेडलाइन दी गई। सवाल बरकरार हैं—क्यों सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी? अंतरराष्ट्रीय नजरिए से देखें तो अमेरिका में राष्ट्रपति हेलिपैड पर एनएएसए-ग्रेड टेस्टिंग होती है, यूके में एआई-बेस्ड प्रेडिक्टिव एनालिसिस। भारत को इसरो के भुवन ऐप और ड्रोन सर्वे अपनाने होंगे। यह हादसा 5 करोड़ वार्षिक श्रद्धालुओं की सुरक्षा का भी सवाल उठाता है।
सुरक्षा के लिए अब ठोस रोडमैप अनिवार्य है। तत्काल कदम उठाएँ, नीति आयोग द्वारा द्वारा सभी 1,200 राज्य हेलिपैड का स्वतंत्र ऑडिट करवाएँ। भारत को जीआईएस मैपिंग और ड्रोन सर्वे जैसे उपाय अपनाने होंगे। दीर्घकालिक लक्ष्य, 2030 तक सभी हेलिपैड स्मार्ट बनाएँ, जो आईओटी सेंसर और ऑटोमेटेड अलर्ट सिस्टम से सुसज्जित हों। यह केवल तकनीक का नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति का प्रश्न है। सबरीमाला की चुप्पी हमें झकझोरती है—लापरवाही अब अस्वीकार्य है। राष्ट्रपति मुर्मू का साहस प्रेरणा देता है, किंतु अगला हादसा किसी का भी हो सकता है। केंद्र और राज्य मिलकर तकनीक अपनाएँ, जवाबदेही सुनिश्चित करें। हमारा लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब राष्ट्रपति और प्रत्येक नागरिक सुरक्षित हों। सुरक्षा केवल औपचारिकता नहीं, राष्ट्र का पवित्र संकल्प है। जागो भारत, सतर्क रहो, कार्रवाई करो—ताकि अगली सुबह सन्नाटे से नहीं, बल्कि विजय की गूंज से गूँजे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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