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सिस्टम की आग में जलते मजदूर, प्रगति का स्वांग कब तक?

 

सिस्टम की आग में जलते मजदूरप्रगति का स्वांग कब तक?

[क्या महाशक्ति की राह श्रमिकों की चिताओं से होकर जाएगी?]

[आठ मौतों से बड़ा सवाल: आखिर एक मजदूर की कीमत कितनी है?]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


जब रोज़ी-रोटी कमाने निकले हाथ आग की लपटों में खो जाएं, तब हादसे सिर्फ दुर्घटनाएं नहीं, व्यवस्था की नाकामी का आईना बन जाते हैं। विशाखापत्तनम स्टील प्लांट में 8 जून 2026 की वह शाम भी ऐसा ही दर्दनाक सच बनकर उभरी। स्टील मेल्टिंग शॉप-1 में लेडल फटने के बाद 1600 डिग्री तापमान की पिघली धातु मजदूरों पर बरसी तो केवल आठ श्रमिकों की जान नहीं गई, बल्कि सुरक्षित और मानवीय औद्योगिक विकास का दावा भी सवालों के घेरे में आ गया। आग ने उनके शरीर झुलसाए, लेकिन उससे कहीं गहरा घाव हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता पर लगा। विकास की चकाचौंध के पीछे छिपा यह अंधेरा पूछ रहा है—क्या इस देश में एक मजदूर की कीमत अब लोहे से भी कम रह गई है?

हर बड़ी त्रासदी से पहले लापरवाही की कई अनदेखी परतें होती हैं। यह हादसा भी अचानक नहीं हुआ। जर्जर मशीनें, सुरक्षा में चूक, अधूरा रखरखाव, कमजोर प्रशिक्षण और ठेका श्रमिकों के प्रति उपेक्षा ने मिलकर वह हालात बनाए, जिनमें आठ जिंदगियां बुझ गईं। विडंबना यह है कि खतरे के संकेत पहले ही मिल चुके थे। कुछ सप्ताह पूर्व इसी संयंत्र में कार्बन मोनोऑक्साइड रिसाव से चार श्रमिक अस्पताल पहुंचे थे। चेतावनी साफ थी, लेकिन व्यवस्था ने उसे नजरअंदाज कर दिया। सच यह है कि हादसे विस्फोट के दिन नहीं होते; वे उसी दिन शुरू हो जाते हैं, जब चेतावनियों को फाइलों में दफना दिया जाता है।

यह सिर्फ विजाग (विशाखापत्तनम) स्टील प्लांट का हादसा नहीं, बल्कि देश की औद्योगिक व्यवस्था का कड़वा सच है। मैन्युफैक्चरिंग, खनन और इस्पात क्षेत्रों में हर वर्ष सैकड़ों श्रमिक मौत के मुंह में समा जाते हैं। जो आंकड़े दिखते हैं, वे अधूरी तस्वीर हैं; असंगठित क्षेत्र में तो कई मौतें रिकॉर्ड तक नहीं बन पातीं। ठेकेदारी व्यवस्था ने श्रमिक को अधिकारों वाले इंसान से ज्यादा एक इस्तेमाल की वस्तु बना दिया है। न पर्याप्त सुरक्षा, न समुचित प्रशिक्षण, न संकट से बचाव की ठोस व्यवस्था। जब एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक संयंत्र में सुरक्षा का यह हाल है, तो उन निजी इकाइयों की स्थिति का अनुमान सहज लगाया जा सकता है, जहां मुनाफा अक्सर इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ जाता है।

इस त्रासदी का सबसे असहज सवाल जवाबदेही का है। हमारे यहां हर बड़े हादसे के बाद वही घिसा-पिटा क्रम दोहराया जाता है—शोक, मुआवजा, जांच समिति और कुछ दिनों तक मीडिया की हलचल। फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। पर क्या कभी सचमुच जिम्मेदारों की पहचान होती है? क्या दोष केवल मशीन का था या महज तकनीकी विफलता का? बिल्कुल नहीं। इस हादसे की जिम्मेदारी प्रबंधन, सुरक्षा तंत्र, निरीक्षण एजेंसियों, श्रम विभाग, सरकारों और उस राजनीतिक संस्कृति पर भी है, जो जवाबदेही से अधिक संरक्षण को महत्व देती है। यदि निरीक्षण निष्पक्ष होते, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होती और भ्रष्टाचार की परतें इतनी मोटी न होतीं, तो शायद यह त्रासदी टाली जा सकती थी। दुर्भाग्य से हमारे यहां हादसों की जांच होती है, व्यवस्था की नहीं।

एक ओर भारत तेज़ आर्थिक विकास, निवेश, विनिर्माण और बुनियादी ढांचे के नए कीर्तिमान गढ़ने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर श्रमिकों की सुरक्षा लगातार सवालों के घेरे में है। किसी भी विकास की असली कसौटी आंकड़े नहीं, बल्कि सबसे कमजोर व्यक्ति की सुरक्षा होती है। यदि उत्पादन बढ़ाने की कीमत श्रमिकों के प्राण बन जाए, तो उसे प्रगति नहीं, संस्थागत अमानवीयता कहना अधिक उचित होगा। किसी राष्ट्र की महानता उसकी गगनचुंबी इमारतों से नहीं, उन हाथों की सुरक्षा से तय होती है जो उन्हें खड़ा करते हैं। दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां अक्सर उत्पादन के लक्ष्य इंसानी जीवन से अधिक मूल्यवान मान लिए जाते हैं।

इस संकट की जड़ें मशीनों में नहीं, मानसिकता में छिपी हैं। यह केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक विफलता है। भ्रष्टाचार, लागत घटाने की होड़, प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक संरक्षण ने ऐसी व्यवस्था गढ़ दी है, जहां मजदूर को इंसान नहीं, बदले जा सकने वाले संसाधन की तरह देखा जाता है। एक श्रमिक की जगह दूसरा मिल सकता है, लेकिन किसी परिवार का सहारा, बच्चों के सपने और माता-पिता की उम्मीदें नहीं लौट सकतीं। सबसे खतरनाक बात यह है कि व्यवस्था अक्सर ऐसी त्रासदियों को सामान्य मानकर आगे बढ़ जाती है। जब किसी वर्ग की पीड़ा साधारण लगने लगे, तब हादसे सिर्फ कारखानों में नहीं, समाज की संवेदनाओं में भी होने लगते हैं।

हर नई त्रासदी यह साबित कर रही है कि चेतावनियों को अब और अनसुना नहीं किया जा सकता। औद्योगिक सुरक्षा को औपचारिकता नहीं, अनिवार्य जिम्मेदारी बनाना होगा। प्रत्येक इकाई में स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट हों और लापरवाही से हुई मौतों पर जिम्मेदार प्रबंधकों, अधिकारियों व ठेकेदारों के खिलाफ केवल विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि आपराधिक मुकदमे चलें। ठेका श्रम व्यवस्था पर सख्त नियंत्रण, श्रमिकों को प्रभावी प्रशिक्षण, आधुनिक सुरक्षा उपकरण और आपात स्थितियों से निपटने की पूरी तैयारी सुनिश्चित की जाए। श्रम कानून कागजों से निकलकर कारखानों तक पहुंचें। सबसे महत्वपूर्ण, सुरक्षा को खर्च नहीं, मानव जीवन की रक्षा में किया गया सबसे आवश्यक निवेश माना जाए।

किसी राष्ट्र की महानता उसकी फैक्ट्रियों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि अपने श्रमिकों के जीवन के प्रति उसकी संवेदनशीलता से मापी जाती है। भारत को महाशक्ति बनने का स्वप्न अवश्य देखना चाहिए, लेकिन उसकी नींव श्रमिकों की चिताओं पर नहीं रखी जा सकती। विजाग की यह त्रासदी केवल आठ परिवारों का शोक नहीं, पूरे देश के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि विकास की दौड़ में मानवीय गरिमा और सुरक्षा को यूं ही नजरअंदाज किया गया, तो कल केवल स्थान, संयंत्र और आंकड़े बदलेंगे, लेकिन श्मशानों की आग और परिवारों का विलाप वही रहेगा। तब इतिहास दर्ज करेगा कि भारत स्टील की भट्टियों में नहीं, अपनी ही संवेदनहीनता और लापरवाही में पिघल रहा था।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com


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