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स्वास्थ्य प्रशासन की परीक्षा में भारत अव्वल

 

स्वास्थ्य प्रशासन की परीक्षा में भारत अव्वल

[संकल्प से सिद्धि तक: मलेरिया उन्मूलन की भारतीय यात्रा]

[संख्या नहीं, संकल्प बोलता है: मलेरिया पर भारत की मौन क्रांति]


·प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


संघर्ष, संकल्प और विज्ञान की त्रिवेणी से भारत ने मलेरिया के विरुद्ध ऐसी ऐतिहासिक विजय अर्जित की है, जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा ही बदल दी है। यह सफलता केवल एक रोग पर नियंत्रण भर नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के जीवन की रक्षा करने वाली राष्ट्रीय उपलब्धि बन चुकी है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च–नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च तथा नेशनल सेंटर फॉर वेक्टर बॉर्न डिज़ीज़ कंट्रोल की “भारत की मलेरिया उन्मूलन की दिशा में प्रगति–2025” शीर्षक नवीनतम तकनीकी रिपोर्ट देश की ऐतिहासिक स्वास्थ्य उपलब्धि को रेखांकित करती है। इसके अनुसार वर्ष 2015 में जहां मलेरिया के 11.7 लाख मामले दर्ज थे, वहीं 2024 तक यह संख्या सिमटकर लगभग 2.27 लाख रह गई। यह अनुमानित 82–85 प्रतिशत की चमत्कारी गिरावट भारत की दूरदर्शी रणनीति और सशक्त क्रियान्वयन का प्रमाण है। इसी अवधि में मलेरिया से होने वाली मौतें 384 से घटकर लगभग 83 रह जाना लगभग 78 प्रतिशत की अभूतपूर्व कमी को दर्शाता है। यह उपलब्धि केवल सांख्यिकीय प्रगति नहीं, बल्कि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित होने योग्य परिवर्तन है। 

यह उपलब्धि किसी आकस्मिक संयोग की देन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि, वैज्ञानिक हस्तक्षेप और दृढ़ प्रशासनिक इच्छाशक्ति का सशक्त परिणाम है। राष्ट्रीय वाहक जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत दीर्घकाल तक प्रभावी कीटनाशक युक्त मच्छरदानियों का व्यापक प्रसार किया गया, जिससे दूरस्थ ग्रामीण और जनजातीय अंचलों में संक्रमण की कड़ी को निर्णायक रूप से तोड़ा जा सका। आर्टेमिसिनिन आधारित संयोजन उपचार को समयबद्ध रूप से अपनाकर उपचार की प्रभावशीलता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया गया। त्वरित जांच किटों के माध्यम से रोग की शीघ्र पहचान सुनिश्चित हुई। एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच द्वारा वास्तविक समय में निगरानी ने प्रत्येक मामले का त्वरित पंजीकरण और उपचार संभव बनाया, जिसके फलस्वरूप देश के लगभग 92 प्रतिशत जिलों में वार्षिक परजीवी सूचकांक 1 से नीचे लाया जा सका। 

वर्तमान में मलेरिया भारत में व्यापक महामारी न रहकर सीमित और विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों तक सिमटा हुआ चुनौतीपूर्ण शत्रु बन गया है। वनाच्छादित क्षेत्र, दुर्गम सीमावर्ती इलाके तथा प्रवासी श्रमिकों के अस्थायी आवास अब भी अपेक्षाकृत अधिक जोखिम में बने हुए हैं। आईसीएमआर की रिपोर्ट रेखांकित करती है कि सीमा-पार संचरण एक गंभीर खतरे के रूप में बना हुआ है, विशेषकर म्यांमार और बांग्लादेश से होने वाले आवागमन के कारण। मौसमी पलायन, धार्मिक उत्सव, मेले और बड़े सामाजिक जमावड़े संक्रमण के प्रसार को गति देते हैं। इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में मलेरिया का पुनरुत्थान एक नई चिंता के रूप में उभरा है, जहां एनोफिलीज स्टेफेंसी मच्छर अनुकूल परिस्थितियां पाकर महानगरों में तेजी से फैल रहा है।

भारत ने वर्ष 2030 तक मलेरिया मुक्त राष्ट्र बनने का स्पष्ट, समयबद्ध और दृढ़ संकल्प निर्धारित किया है, जिसमें 2027 तक स्वदेशी मामलों को शून्य पर लाना एक निर्णायक पड़ाव माना गया है। वर्ष 2023 तक 24 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश उस श्रेणी में पहुंच चुके हैं जहां वार्षिक परजीवी सूचकांक 1 से नीचे आ गया है। लद्दाख, लक्षद्वीप और पुडुचेरी जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी मलेरिया मामलों का पूर्ण अभाव दर्ज होना इस दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि है। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत जांच और उपचार को निःशुल्क बनाकर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को व्यापक और सुलभ बनाया गया है। वहीं आशा कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर जागरूकता फैलाते हुए जनसहभागिता को इस अभियान की प्राणशक्ति बना दिया है।

इस राष्ट्रीय अभियान को राजनीतिक नेतृत्व का सशक्त और निरंतर समर्थन प्राप्त रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री द्वारा रिपोर्ट के विमोचन के अवसर पर इसे वैश्विक स्तर पर भारत के उभरते स्वास्थ्य नेतृत्व की दिशा में निर्णायक कदम बताया गया। उच्चस्तरीय समीक्षा बैठकों, राज्यों के साथ सतत समन्वय और उत्तरदायित्व आधारित कार्यसंस्कृति ने कार्यक्रम को मजबूत आधार प्रदान किया है। नीति निर्माण से लेकर जमीनी क्रियान्वयन तक स्पष्ट दिशा और जवाबदेही सुनिश्चित की गई है। यही कारण है कि भारत की प्रगति को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्यापक सराहना मिल रही है और अनेक देश इसे अनुकरणीय मॉडल के रूप में स्वीकार कर रहे हैं।

फिर भी यह स्वीकार करना आवश्यक है कि चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। कीटनाशकों और दवाओं के प्रति बढ़ता प्रतिरोध भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी बनकर उभर रहा है। निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में अपूर्ण अथवा विलंबित रिपोर्टिंग के कारण वास्तविक स्थिति के सटीक आकलन में बाधा आती है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से नए जलभराव क्षेत्र विकसित हो रहे हैं, जो मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करते हैं। तीव्र शहरीकरण और बड़े पैमाने पर प्रवासन ने रोग नियंत्रण की प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना दिया है। विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि यदि निगरानी, अनुसंधान और हस्तक्षेपों में निरंतरता नहीं रखी गई, तो अब तक अर्जित उपलब्धियां कमजोर पड़ सकती हैं।

इन उभरती चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए 2026 तक केस-आधारित निगरानी प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की ठोस योजना तैयार की गई है। बहु-क्षेत्रीय समन्वय को अनिवार्य मानते हुए शहरी निकायों, पर्यावरण विभागों, श्रम संगठनों तथा निजी क्षेत्र की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जा रही है। आधुनिक डिजिटल प्रौद्योगिकी, भू-स्थानिक विश्लेषण और पूर्वानुमान आधारित मॉडल भविष्य की रणनीति की रीढ़ बनते जा रहे हैं। इसके साथ ही समुदाय आधारित निगरानी, स्थानीय नेतृत्व और स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका का विस्तार कर इस अभियान को जनआंदोलन का व्यापक स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है।

यह उपलब्धि वस्तुतः सामूहिक संकल्प, वैज्ञानिक नवाचार और जनभागीदारी की प्रेरक गाथा है। विशेष रूप से जनजातीय और वन क्षेत्रों में किए गए लक्षित हस्तक्षेपों ने सर्वाधिक प्रभाव डाला है, जहां मच्छरदानियों का वितरण और सक्रिय खोज अभियान जीवनरक्षक सिद्ध हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भारत को उच्च बोझ से उच्च प्रभाव समूह से बाहर निकलने पर औपचारिक बधाई दिया जाना इस सफलता की वैश्विक स्वीकृति है। देश के नेतृत्व ने भी स्वतंत्रता के बाद से अब तक की कुल प्रगति में लगभग 97% गिरावट का उल्लेख करते हुए शीघ्र पूर्ण उन्मूलन का दृढ़ विश्वास व्यक्त किया है। लाखों बच्चों और महिलाओं की सुरक्षित हुई जिंदगियां इस संघर्ष की सबसे प्रामाणिक साक्षी हैं।

आगामी समय में निरंतर निवेश, अनुसंधान और नवाचार ही इस उपलब्धि को स्थायित्व प्रदान करेंगे। बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण, निजी सहभागिता और सामुदायिक सशक्तिकरण को नीति-निर्माण के केंद्र में रखना अनिवार्य होगा। जलवायु-अनुकूल रणनीतियों तथा दवा प्रतिरोध पर केंद्रित गहन अनुसंधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि वर्तमान गति, समर्पण और प्रतिबद्धता बनी रही, तो 2030 का लक्ष्य न केवल प्राप्त होगा, बल्कि भारत वैश्विक मलेरिया उन्मूलन का आदर्श मॉडल बनकर उभरेगा। यह यात्रा सिद्ध करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, विज्ञान और जनभागीदारी मिलकर असंभव को संभव बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ, सुरक्षित तथा समृद्ध भविष्य की नींव रख सकते हैं।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)


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