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स्वच्छ हवा का मोल

 

स्वच्छ हवा का मोल: बजट ने तय कर दिया कि यह अब विलासिता है

[कटौती का धुआँ: बजट में प्रदूषण नियंत्रण क्यों हुआ कमजोर?]

[स्वच्छ हवा का मौलिक अधिकार अब बजट का सबसे सस्ता शिकार]


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


हवा में घुलता ज़हर जब रोज़मर्रा की सच्चाई बन जाए, तब नीतियों की प्राथमिकताएँ सवालों के घेरे में आ जाती हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में प्रदूषण नियंत्रण योजना के लिए केवल 1091 करोड़ रुपये रखे गए हैं, जबकि पिछले वर्ष यह राशि 1300 करोड़ रुपये थी—यानी 209 करोड़ रुपये की कमी। यह कटौती ऐसे समय हुई है जब दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत में वायु प्रदूषण जानलेवा स्तर पर है। सांस संबंधी बीमारियों के मरीज अस्पतालों में लगातार बढ़ रहे हैं और इलाज का खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में यह कमी स्वास्थ्य सुरक्षा पर सीधा दबाव बढ़ाती है। विकास के नाम पर क्या हम अपनी ही सांसों की कीमत चुका रहे हैं—यह प्रश्न अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।

साफ हवा अब अधिकार नहीं, चुनौती बनती जा रही है, और इसका बोझ सीधे स्वास्थ्य व्यवस्था पर दिख रहा है। भारत में बाहरी और घरेलू वायु प्रदूषण मिलाकर हर वर्ष लगभग 15–20 लाख असमय मौतों से जुड़ा माना जाता है। दिल्ली-एनसीआर में पीएम-2.5 का लगातार ऊँचा स्तर जीवन प्रत्याशा को 8.2 वर्ष (2025 एक्यूएलआई रिपोर्ट) तक घटा रहा है। 2022–2024 के बीच दिल्ली के छह प्रमुख अस्पतालों में 2 लाख से अधिक तीव्र श्वसन संक्रमण (एआरआई) के मामले आए, जिनमें 30,424 मरीजों को भर्ती करना पड़ा। आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि पीएम-2.5 में हर 10 इकाई वृद्धि पर श्वसन रोगों के अस्पताल मामलों में 7 की बढ़ोतरी होती है। ऐसे समय में जब स्वास्थ्य सुधार की बातें होती हैं, प्रदूषण नियंत्रण फंड में कटौती स्थिति को और कमजोर करती है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) की धीमी रफ्तार आम लोगों की सेहत पर सीधा असर डाल रही है।

यह कटौती केवल बजट का बदलाव नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य पर सीधा असर डालने वाला निर्णय है। जहरीली हवा का प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं—तीनों पर साफ दिख रहा है; बच्चे सांस की तकलीफ झेल रहे हैं, बुजुर्गों में हृदय रोग बढ़ रहे हैं। महिलाएं घरेलू कामों के साथ बाहर की जहरीली हवा सहन कर रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली में पीएम-2.5 के हर 10 यूनिट बढ़ने पर हृदय संबंधी अस्पताल भर्ती में लगभग 2% (दिल्ली पायलट अध्ययन) की वृद्धि होती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एनसीएपी के संसाधन घटने से निगरानी सख्ती और समाधान तीनों प्रभावित होंगे। पहले ही एनसीएपी/एक्सवी-एफसी फंड्स का उपयोग केवल 74% तक सीमित रहा है। नई कटौती से स्थिति और गंभीर होने की आशंका है। आमजन की सांसें महंगी हो रही हैं, लेकिन सरकार का फोकस अन्य क्षेत्रों पर केंद्रित दिख रहा है।

अस्पतालों पर बढ़ता दबाव अब व्यवस्था की वास्तविक स्थिति दिखा रहा है। इस कटौती से पहले से कमजोर स्वास्थ्य ढांचा और प्रभावित हुआ है। सरकारी अस्पतालों में बेड की कमी और डॉक्टरों पर बोझ लगातार बना है। प्रदूषण के कारण क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (सीओपीडी), अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोग के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और कठिन है, जहां सुविधाएं सीमित हैं। बजट 2026 में स्वास्थ्य क्षेत्र को वृद्धि मिली है, लेकिन प्रदूषण से होने वाली बीमारियों का खर्च उस बढ़ोतरी को निगल जाएगा। डब्ल्यूएचओ और लैंसेट के अनुसार वायु प्रदूषण कैंसर, स्ट्रोक और हृदय रोगों का बड़ा कारण है। यदि फंड कटौती जारी रही, तो स्वास्थ्य बजट का अधिकांश हिस्सा इलाज में ही खर्च होगा, रोकथाम पीछे रह जाएगी।

जब स्वच्छ हवा का अधिकार संकट में हो, तब आधे-अधूरे कदम पर्याप्त नहीं होते। प्रदूषण नियंत्रण फंड को बहाल कर बढ़ाना जरूरी है और एनसीएपी को मजबूत बनाने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, सड़क धूल नियंत्रण, पराली जलाने पर रोक और औद्योगिक उत्सर्जन पर सख्त निगरानी आवश्यक है। आमजन को भी जागरूक होना पड़ेगा। मास्क का उपयोग, सार्वजनिक परिवहन अपनाना, घरों में हरियाली और वृक्षारोपण जैसे छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट और कई अध्ययन स्पष्ट कर चुके हैं कि स्वच्छ वायु मौलिक अधिकार है, इसलिए बजट और नीतियों में इसकी रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

हालात की गंभीरता के बीच कुछ सकारात्मक संकेत जरूर हैं, लेकिन वे बढ़ते संकट के सामने बहुत छोटे लगते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को 123 करोड़ रुपये का आवंटन मिला है, जो पिछले संशोधित अनुमान से थोड़ा अधिक है, साथ ही पर्यावरण शिक्षा और क्षमता निर्माण पर भी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन ये सीमित प्रयास उस बड़े संकट के सामने पर्याप्त नहीं हैं, जहां दिल्ली की हवा लगातार दुनिया की सबसे खराब श्रेणी में बनी रहती है और गाजियाबाद का लोनी जैसे क्षेत्र दुनिया की सबसे प्रदूषित सूची में शीर्ष पर दिखाई देते हैं। एनसीएपी के 40% लक्ष्य की प्रगति अभी भी धीमी है। ऐसे परिदृश्य में आंशिक सुधार नहीं, बल्कि समग्र और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें केंद्र, राज्य और नागरिक मिलकर वास्तविक बदलाव की दिशा में काम करें।

विकास का असली पैमाना वही है जिसमें हर नागरिक सुरक्षित सांस ले सके। बजट 2026 की यह कटौती स्पष्ट करती है कि आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय स्वास्थ्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथ चलने वाली जरूरतें हैं। प्रदूषण को लगातार नजरअंदाज करने का परिणाम स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते दबाव और व्यवस्था की कमजोरी के रूप में सामने आएगा। इसलिए सरकार, विशेषज्ञ और जनता—तीनों के साझा प्रयास से एक ठोस रोडमैप जरूरी है, जिसमें फंड में वृद्धि, कानूनों का सख्त पालन और जन-जागरूकता शामिल हो। तभी आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ हवा मिल सकेगी, अन्यथा हर सांस के साथ हमारा स्वास्थ्य और भविष्य दोनों जोखिम में रहेंगे।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com


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