संविधान की शक्ति के आगे ट्रंप लाचार
[सवाल बरकरार: क्या यह ट्रंप की टैरिफ नीति का अंत है?]
डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने वैश्विक व्यापार को अपनी मुट्ठी में करने का सपना देखा, को 29 अगस्त को अमेरिकी फेडरल सर्किट अपीलीय अदालत ने करारा झटका दिया। 7-4 के ऐतिहासिक फैसले में ट्रंप के 'रेसिप्रोकल' टैरिफ को गैरकानूनी और अमान्य करार दिया गया। यह टैरिफ चीन, मैक्सिको, कनाडा और अन्य देशों पर थोपे गए, ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का आधार थे। अदालत ने दो टूक कहा, राष्ट्रपति की शक्ति संविधान से ऊपर नहीं। इस फैसले ने न केवल ट्रंप की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की हवा निकाल दी, बल्कि वैश्विक व्यापार में नए तनाव की आहट दी। 14 अक्टूबर तक यह फैसला लागू नहीं होगा, जिससे ट्रंप प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट में अपील का मौका मिला है। यह कानूनी जंग अब वैश्विक अर्थव्यवस्था, अमेरिकी लोकतंत्र और ट्रंप की विदेश नीति के भविष्य को दांव पर लगाए हुए है।
फरवरी 2025 में, अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में, डोनाल्ड ट्रंप ने चीन, मैक्सिको और कनाडा पर कड़े टैरिफ थोपकर फेंटेनिल तस्करी और अवैध आप्रवासन पर प्रहार किया। अप्रैल 2025 में, उनकी नाटकीय 'लिबरेशन डे' घोषणा ने दुनिया भर पर 10% बेसलाइन टैरिफ लाद दिया, जिसमें चीन पर 34% और भारत पर 50% जैसे सख्त 'रेसिप्रोकल' टैरिफ शामिल थे। ट्रंप का तर्क था कि 2024 का $1.2 ट्रिलियन का व्यापार घाटा (यूएस सेंसस ब्यूरो) अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को खोखला कर रहा है, जिससे विनिर्माण, आपूर्ति श्रृंखलाएँ और सैन्य शक्ति कमजोर हो रही है। इसके लिए उन्होंने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) का सहारा लिया, व्यापार घाटे और फेंटेनिल संकट को 'राष्ट्रीय आपातकाल' करार दिया। मगर अदालत ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया, ट्रंप की इस महत्वाकांक्षी नीति पर गहरे सवाल खड़े कर दिए।
फेडरल सर्किट अपीलीय अदालत ने 7-4 के ऐतिहासिक फैसले में डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ तर्क को ध्वस्त कर दिया। अदालत ने साफ कहा, 1977 का इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं देता। अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया, “आईईईपीए कर लगाने का अधिकार नहीं देता।” यह कानून प्रतिबंधों, जैसे विदेशी संपत्तियों को फ्रीज करने, के लिए है, न कि टैरिफ के लिए। सुप्रीम कोर्ट के 'मेजर क्वेश्चन डॉक्ट्रिन' का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि बड़े आर्थिक प्रभाव वाले फैसलों के लिए कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी जरूरी है। ट्रंप का आईईईपीए का इस्तेमाल 'अनपेक्षित' और संवैधानिक शक्तियों के पृथक्करण के खिलाफ था।
अदालत ने दो आधारों पर टैरिफ को खारिज किया। पहला, व्यापार घाटा कोई 'राष्ट्रीय आपातकाल' नहीं। यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव के मुताबिक, 1970 के दशक से अमेरिका व्यापार घाटे में है—यह कोई नया खतरा नहीं। दूसरा, फेंटेनिल से जुड़े टैरिफ समस्या का समाधान नहीं, बल्कि दबाव का हथियार हैं। संविधान के अनुच्छेद 1, धारा 8 के तहत, कर लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस का है। आईईईपीए के जरिए ट्रंप का यह कदम संविधान को चुनौती था। यह फैसला मई 2025 के यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के निर्णय को और मजबूती देता है, जिसमें ट्रंप द्वारा नियुक्त जज भी शामिल थे।
कनाडा पर लगे 'ट्रैफिकिंग टैरिफ' अब गैरकानूनी ठहराए गए हैं। यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ टैरिफ पर आधारित व्यापार समझौते अब डगमगा रहे हैं। ट्रंप का दावा था कि ये टैरिफ अमेरिकी विनिर्माण को फिर से जागृत करेंगे, लेकिन टैक्स फाउंडेशन का अनुमान उल्टा है: 2025 में प्रत्येक अमेरिकी परिवार पर $1,300 का अतिरिक्त बोझ, 1.2% बढ़ती मुद्रास्फीति और जीडीपी में 0.9% की गिरावट। एनपीआर की चेतावनी है कि ये टैरिफ 1930 के स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट के बाद सबसे भारी हैं, जिसने ग्रेट डिप्रेशन को और गहरा किया था।
बाजारों में उथल-पुथल मची है। फैसले के बाद स्टॉक मार्केट में हल्की उछाल देखी गई, लेकिन अनिश्चितता का साया बरकरार है। आयात पर निर्भर छोटे व्यवसाय सबसे ज्यादा चपेट में आएंगे। भारत जैसे देशों पर 50% टैरिफ ने उनके निर्यात को पहले ही झटका दिया था। अब यह फैसला वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को कुछ राहत दे सकता है, लेकिन ट्रंप की आर्थिक रणनीति पर सवालों का बादल मंडरा रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अदालत के फैसले को 'पक्षपातपूर्ण' ठहराते हुए आग उगली। उन्होंने कहा - “ये जज अमेरिका को तबाह करना चाहते हैं। टैरिफ के बिना हमारा विनिर्माण खत्म हो जाएगा!” व्हाइट हाउस ने इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का हथियार बताकर सुप्रीम कोर्ट में अपील की घोषणा की। सुप्रीम कोर्ट में 6-3 का कंजर्वेटिव बहुमत है, जिसमें ट्रंप द्वारा नियुक्त तीन जज शामिल हैं। मगर 'मेजर क्वेश्चन डॉक्ट्रिन' और 'नॉन-डेलिगेशन डॉक्ट्रिन' उनके रास्ते में रोड़ा बन सकते हैं। हाल ही में ईपीए मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि बड़े निर्णयों के लिए कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी जरूरी है। अगर सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के पक्ष में गया, तो राष्ट्रपति को अभूतपूर्व आर्थिक शक्ति मिल सकती है। अगर नहीं, तो कांग्रेस को टैरिफ नीति पर नए सिरे से विचार करना होगा।
ट्रंप के पास वैकल्पिक रास्ते हैं। सेक्शन 232 (ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट, 1962) स्टील और एल्यूमिनियम जैसे क्षेत्रों में टैरिफ की इजाजत देता है, लेकिन इसमें लंबी जांच और सुनवाई की जरूरत है। सेक्शन 301 (ट्रेड एक्ट, 1974) अनुचित व्यापार प्रथाओं, जैसे चीन की, के खिलाफ टैरिफ की अनुमति देता है, पर यह आईईईपीए की तुलना में जटिल और धीमा है। ट्रंप की तेज-तर्रार और चौंकाने वाली रणनीति अब गहरे संकट में फंस चुकी है।
अमेरिकी लोकतंत्र की ताकत ने एक बार फिर खुद को साबित किया। फेडरल सर्किट अपीलीय अदालत के फैसले ने स्पष्ट कर दिया - राष्ट्रपति हो या कोई और, कोई भी संविधान से ऊपर नहीं। लेकिन सवाल बरकरार है, क्या यह ट्रंप की टैरिफ नीति का अंत है, या सुप्रीम कोर्ट में नई जंग की शुरुआत? 2026 तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला वैश्विक व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितता के बादल छाए रखेगा। ट्रंप ने टैरिफ के बल पर अमेरिका को फिर से महान बनाने का सपना देखा था, मगर अदालत ने सिद्ध किया कि असली शक्ति संविधान और कानून की सर्वोच्चता में निहित है। यह एक ऐसा युद्ध है, जहाँ कानून की किताबें तलवारों से तेज हैं, और जीत उसी की होगी जो संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान करे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY