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[प्रसंगवश – 06 जुलाई: विश्व ज़ूनोसिस दिवस]
वन, पशु और मानव – एक ही साँस की डोर पर टिके जीवन का महासंग्राम
[जब पशु बीमार पड़ते हैं, इंसान मरता है – ज़ूनोसिस का क्रूर सत्य]
एक नन्हा सा वायरस, किसी जंगल की गहराइयों में पल रहे प्राणी से जन्मा, पूरी मानव सभ्यता को हिलाकर रख सकता है। विश्व ज़ूनोसिस दिवस, जो हर 6 जुलाई को आता है, हमें यही कठोर सत्य याद दिलाता है—हमारी धरती कितनी नाज़ुक है, हमारे जीवन कितने आपस में जुड़े हैं। एक कुत्ते का काटना, एक चमगादड़ की उड़ान, या गाय के दूध में छिपा रोग, चुपके से हमारे घरों तक पहुँच सकता है। यह दिन केवल चेतावनी नहीं, बल्कि एक प्रबल जागृति की पुकार है। यह हमें बताता है कि हम और पशु एक ही साँस, एक ही धरती के बंधन में बँधे हैं। लापरवाही अब मंजूर नहीं—यह समय है सजग होने का, एकजुट होने का, और इस अदृश्य शत्रु से डटकर मुकाबला करने का। विश्व ज़ूनोसिस दिवस सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, यह एक संकल्प है—हमारी दुनिया को सुरक्षित रखने का, आज और हमेशा।
ज़ूनोसिस—यह शब्द नहीं, एक चुपके से दस्तक देता तूफ़ान है, जो पशुओं से मनुष्यों तक छलाँग लगाकर सभ्यताओं को झकझोर सकता है। ग्रीक भाषा में “ज़ून” यानी पशु और “नोसिस” यानी रोग—यह वे अदृश्य शत्रु हैं जो जंगलों, खेतों और हमारे आसपास के प्राणियों से निकलकर हमारे घरों की देहरी लाँघ जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनी गूँजती है: विश्व के 60% संक्रामक रोग ज़ूनोटिक हैं, और 75% से अधिक नई बीमारियाँ पशुओं से जन्म लेती हैं। रेबीज, जो हर साल 59,000 जिंदगियों को निगल जाता है, जिसमें 40% मासूम बच्चे हैं; ब्रुसेलोसिस, जो भारत के गाँवों में चुपके से तबाही मचाता है; और कोविड-19, जिसने 70 लाख से अधिक लोगों को असमय छीन लिया—ये ज़ूनोसिस के भयावह चेहरे हैं। भारत में, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की रिपोर्ट चीख-चीखकर बताती है: रेबीज हर साल 20,000 जिंदगियाँ छीन लेता है, जो वैश्विक आँकड़ों का एक तिहाई है। ये सिर्फ़ संख्याएँ नहीं, बल्कि टूटे परिवारों की अनसुनी पुकार हैं।
6 जुलाई का दिन इतिहास की एक ऐसी गूँज है, जो साहस और विज्ञान की विजय को गाती है। सन 1885 में, लुई पाश्चर ने रेबीज के टीके से एक मासूम बच्चे की जान बचाकर मानवता को एक नई उम्मीद दी। यह वह पल था, जब एक प्राणघातक रोग, जो एक बार पकड़ में आने पर 100% मृत्यु की सजा सुनाता है, पहली बार मानव के साहस के सामने घुटने टेका। रेबीज आज भी उन कोनों में कहर ढाता है, जहाँ जागरूकता की रोशनी मंद है और टीकाकरण का अभाव है। पाश्चर की यह जीत सिर्फ़ एक वैज्ञानिक मील का पत्थर नहीं, बल्कि एक ज्वलंत संदेश है—विज्ञान, दृढ़ता और सामूहिक संकल्प से कोई भी अदृश्य दुश्मन अजेय नहीं।
आज की यह लड़ाई पहले से कहीं अधिक जटिल और गहन है। भारत, जहाँ पशुपालन न केवल आजीविका का आधार है, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है, वहाँ ज़ूनोटिक रोग एक निस्तब्ध, अदृश्य खतरा बनकर मँडराते हैं। ब्रुसेलोसिस, जो संक्रमित पशुओं के दूध या निकट संपर्क से फैलता है, ग्रामीण भारत में हज़ारों लोगों को लंबे बुखार और अंतहीन थकान की जकड़ में ले रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की चेतावनी गूँजती है—लेप्टोस्पायरोसिस और स्क्रब टाइफस जैसे रोग हर साल लाखों जिंदगियों को अपनी चपेट में लेते हैं। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (ओआइई) का खुलासा और भी डरावना है—पशुजन्य रोगों से भारत को हर साल अरबों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। लेकिन यह सिर्फ़ संख्याओं की कहानी नहीं; यह उन माँओं की पुकार है, जो अपने बच्चों को खो देती हैं; उन किसानों का दर्द है, जिनकी मेहनत की कमाई रोग की भेंट चढ़ जाती है।
हमारी अपनी करतूतों ने इस संकट को जन्म दिया है—वनों की बेरहम कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण, और जलवायु परिवर्तन ने मनुष्य और जंगली जीवों के बीच की नाज़ुक रेखा को मिटा दिया है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की चेतावनी चौंकाने वाली है—पिछले कुछ दशकों में वन्यजीवों के आवास 70% तक सिकुड़ चुके हैं, जिसने नए वायरस और बैक्टीरिया को मानवता के दरवाज़े तक ला खड़ा किया है। कोविड-19 इसका सबसे भयावह प्रमाण है—एक ऐसी त्रासदी, जिसने न केवल लाखों जिंदगियाँ छीनीं, बल्कि पूरी दुनिया को घुटनों पर लाकर समय को जैसे स्थिर कर दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान डरावना है—इस महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर का नुकसान पहुँचाया। यह प्रकृति का कठोर संदेश है: उसके साथ छेड़छाड़ की सजा सिर्फ़ एक नहीं, पूरी मानवता भुगतती है।
“वन हेल्थ” दृष्टिकोण इस संकट के खिलाफ हमारा सबसे शक्तिशाली हथियार है। यह सिद्धांत चीख-चीखकर कहता है कि मनुष्य, पशु और पर्यावरण का स्वास्थ्य एक अटूट बंधन में बंधा है—एक की रक्षा, सबकी रक्षा। यदि हम पशुओं को स्वस्थ रखें, प्रकृति को सहेजें, तो मानवता का कवच अपने आप मज़बूत होगा। भारत सरकार ने इस दिशा में साहसिक कदम उठाए हैं—‘राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ के तहत फुट-एंड-माउथ डिज़ीज़ और ब्रुसेलोसिस जैसे रोगों के खिलाफ व्यापक टीकाकरण अभियान गूँज रहा है। साथ ही, ‘राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम’ का संकल्प है कि 2030 तक भारत रेबीज के भय से मुक्त होगा। मगर यह सपना तभी साकार होगा, जब समाज का हर व्यक्ति अपनी भूमिका निभाए। हमें स्वच्छता को जीवन का मंत्र बनाना होगा, पालतू पशुओं का नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करना होगा, और दूषित मांस या दूध से दूरी बनानी होगी।
विश्व ज़ूनोसिस दिवस केवल एक तारीख़ नहीं, बल्कि एक ज़ोरदार आह्वान है—एक ऐसी सामाजिक क्रांति का, जो अस्पतालों और प्रयोगशालाओं की दीवारों को तोड़कर हर गली, हर गाँव तक गूँजनी चाहिए। यह हमें पुकारता है कि हम अपने बच्चों को स्कूलों में पर्यावरण और पशु स्वास्थ्य की रक्षा का पाठ पढ़ाएँ, उनकी चेतना को जागृत करें। मीडिया को डर की लहरें फैलाने के बजाय समाधान की रोशनी बिखेरनी होगी, जागरूकता के दीप जलाने होंगे। गाँव की पंचायतों से लेकर शहर की नगरपालिकाओं तक, हर स्तर पर एकजुट और संगठित प्रयास अब अनिवार्य हैं। सोचिए, एक छोटा सा गाँव भी अगली वैश्विक महामारी की चिंगारी बन सकता है! ज़ूनोटिक रोग न सीमाओं को मानते हैं, न जाति-वर्ग का भेद करते हैं। यह ऐसी आग है, जो एक चिंगारी से भड़ककर सारी दुनिया को राख कर सकती है।
विश्व ज़ूनोसिस दिवस हमें हमारी नाज़ुकता का कठोर दर्पण दिखाता है। हमारी सभ्यता भले ही कितने ही ऊँचे शिखर छू ले, पर यदि हमने प्रकृति और पशुओं के साथ अपने बंधन को नहीं संवारा, तो हमारा सारा गर्व पल में राख हो जाएगा। यह दिवस कोई औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि एक गूँजता हुआ आह्वान है—करुणा, जिम्मेदारी और साहस की राह पर चलने की प्रेरणा। यह हमें सिखाता है कि हमारी असली ताक़त हमारी एकजुटता में, हमारे विज्ञान की प्रगति में, और हमारी जागरूकता की ज्वाला में छिपी है। यह वह निर्णायक क्षण है, जब हमें चुनना है—क्या हम अपने बच्चों को एक ऐसी दुनिया सौंपना चाहते हैं, जहाँ हर सुबह डर की छाया के साथ आए, या एक ऐसी दुनिया, जो स्वस्थ, सुरक्षित और सामंजस्य से भरी हो?
विश्व ज़ूनोसिस दिवस एक ऐतिहासिक चौराहा है—या तो हम आज सजग होकर अपने भविष्य को बचा लें, या अपनी लापरवाही की सजा अगली महामारी के रूप में भुगतें। यह वह घड़ी है, जब हमें विज्ञान की ताकत को अपनाना है, प्रकृति के प्रति श्रद्धा जागृत करनी है, और अपने समाज को एकता के सूत्र में बाँधना है। यह वह पल है, जब हमारा एक छोटा सा प्रयास, एक नन्हा कदम, मानवता की सबसे गौरवशाली विजय बन सकता है। इस 6 जुलाई को हम प्रण करें—हम न केवल अपने लिए, बल्कि इस धरती के हर प्राणी के लिए एक ऐसी दुनिया रचेंगे, जहाँ हर साँस जीवन की खुशबू बिखेरे, हर कदम उम्मीद की राह पर बढ़े। यह हमारा संकल्प हो—उस माँ धरती के लिए, जो हमें सींच रही है। यह हमारी हुंकार हो—एक स्वस्थ, एकजुट, और अडिग मानवता की हुंकार।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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