Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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सीवर में छिपी असुरक्षित सच्चाई

 


कानून हैंयोजनाएं हैंफिर भी सीवर में मौतें — आखिर जिम्मेदार कौन?

[सफाई कर्मी नहीं, यह व्यवस्था की सबसे अनदेखी लड़ाई के सिपाही हैं]

[स्वच्छ भारत अभियान का दूसरा चेहरा: सीवर में छिपी असुरक्षित सच्चाई]



शहरों की चमक जब स्वच्छता के दावों से आत्ममुग्ध होकर दमकती है, उसी क्षण उसी चमक के भीतर छिपा अंधकार चुपचाप इंसानी जिंदगियों को निगलता चला जाता है। मार्च 2026 की शुरुआत में स्वच्छता के शिखर पर खड़े इंदौर में, चोइथराम मंडी गेट के पास एक सीवर चैंबर दो जिंदगियों का अंत बन गया—करण यादव और अजय डोडी जहरीली गैसों के कारण दम घुटने से काल के गाल में समा गए। बिना किसी सुरक्षा उपकरण के वे उस घातक गहराई में उतरे; एक के अचेत होते ही दूसरा उसे बचाने भीतर गया, पर दोनों ही वापस नहीं लौट सके। यह घटना महज एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा नहीं, बल्कि उस विफल व्यवस्था की कठोर सच्चाई है, जो अपने सबसे कमजोर कर्मियों को सुरक्षित रखने में बार-बार असफल साबित हो रही है।

पीड़ा की यह आग अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि कुछ ही सप्ताह बाद 15 अप्रैल 2026 को हरियाणा के नूह जिले के फिरोजपुर झिरका में वही भयावह दृश्य फिर दोहराया गया। पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग विभाग के ठेकेदार ने तीन मजदूरों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के सीवर में उतार दिया, जहां जहरीली गैसों ने दो जीवन—राजेंद्र कुमार और अब्दुल कलाम—को निगल लिया, जबकि तीसरा मजदूर गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचा। इस तरह की लगातार होती घटनाएं यह साफ संकेत देती हैं कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक खतरनाक और स्थापित होती जा रही व्यवस्था बन चुकी है। देश के अलग-अलग कोनों में फैलती यह मौतें बार-बार यह कठोर सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर कब तक गरीब मजदूर अपनी जान की कीमत पर हमारी स्वच्छता की जिम्मेदारी ढोते रहेंगे।

संवैधानिक अधिकारों और मानव गरिमा की रक्षा के दावों के बीच भी इन घटनाओं की अनदेखी संभव नहीं रह सकी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इंदौर मामले पर 5 मार्च 2026 और नूह मामले पर 24 अप्रैल 2026 को स्वतः संज्ञान लेते हुए अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का हवाला देकर स्पष्ट किया कि बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर में उतरना मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। रिपोर्ट में सुरक्षा उपकरणों की कमी, ठेकेदारी व्यवस्था की खामियां और मुआवजे की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया गया। यह हस्तक्षेप दिखाता है कि यह समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और प्रशासनिक विफलता का परिणाम भी है।

सांख्यिकीय सच्चाइयों की परतें जैसे-जैसे खुलती हैं, यह संकट और अधिक भयावह रूप लेता है। सफाई कर्मचारी आंदोलन के अनुसार 2014 से 2025 के बीच 859 सफाई कर्मियों की जान सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में गई। 2017 से मार्च 2026 तक 622 मौतें दर्ज हुईं, जबकि 2026 के पहले चार महीनों में ही 50 से अधिक मौतें हो चुकी हैं। सरकारी आंकड़े अक्सर कम बताते हैं, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक कठोर है। हर साल औसतन 80 से 130 सफाई कर्मी हाइड्रोजन सल्फाइड और मीथेन जैसी जहरीली गैसों से दम घुटने के कारण जान गंवा रहे हैं। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों की टूटी हुई कहानियां हैं जिन्होंने अपने अपनों को हमेशा के लिए खो दिया है।

कानूनों और न्यायिक आदेशों की मौजूदगी के बावजूद जमीन पर बदलाव न दिखना इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है। 2013 का मैनुअल स्कैवेंजिंग निषेध और पुनर्वास अधिनियम इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मैकेनाइज्ड सफाई अनिवार्य करते हुए मृतक परिवारों को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। फिर भी इंदौर और नूह मामलों में मुआवजे की घोषणा के बावजूद सवाल बना रहता है कि क्या केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त है? ठेकेदारों की लापरवाही, सुरक्षा उपकरणों की कमी और कमजोर निगरानी व्यवस्था इन कानूनों को कागजों तक सीमित कर देती है।

घोषित नीतियों और धरातल की सच्चाई के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। स्वच्छ भारत मिशन-2 और ‘नामास्ते’ जैसी योजनाओं में मैकेनाइज्ड सफाई तथा सफाई कर्मियों के कल्याण पर विशेष जोर दिया गया है, जिसके लिए हजारों करोड़ रुपये भी आवंटित किए गए हैं। इसके बावजूद इंदौर जैसे शहरों में आधुनिक मशीनें होते हुए भी उनका नियमित उपयोग नहीं किया जाता, जबकि नूह जैसे क्षेत्रों में ठेकेदार जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। सस्ती मजदूरी के लालच में मानव जीवन को जोखिम में डाल दिया जाता है और इस पूरे तंत्र का सबसे भारी बोझ दलित समुदाय पर पड़ता है, जो आज भी सामाजिक भेदभाव और उपेक्षा झेल रहा है।

इस संकट के समाधान की मांग अब केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। अब समय है कि केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस और कठोर कदम उठाए जाएं। हर शहर में 100% मैकेनाइज्ड सफाई अनिवार्य हो, ताकि कोई मजदूर जान जोखिम में डालकर सीवर में न उतरे। ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई—भारी जुर्माना, ब्लैकलिस्टिंग और कानूनी दंड—तुरंत लागू किया जाए। प्रत्येक मृत्यु पर 30 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को नौकरी और बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाए। साथ ही सफाई कर्मियों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, बीमा और प्रशिक्षण अनिवार्य हों, ताकि उनकी सुरक्षा और सम्मान वास्तविक रूप से सुनिश्चित हो सके।

यह स्थिति हमारी सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी पर सीधा प्रश्न उठाती है कि जब हर महीने सफाई कर्मी जान गंवा रहे हैं, तो स्वच्छता अभियान वास्तव में किसके लिए है। इंदौर जैसे स्वच्छता के प्रतीक शहर और नूह जैसे क्षेत्र भी इस त्रासदी से अछूते नहीं हैं, तो छोटे शहरों और गांवों की स्थिति सहज ही समझी जा सकती है। यदि इन अज्ञात नायकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी, तो हमारी उपलब्धियां खोखली साबित होंगी। अब समय है कि नारों से आगे बढ़कर वास्तविक कदम उठाए जाएं, अन्यथा हर मौत हमें याद दिलाती रहेगी कि स्वच्छता की कीमत किसी और की जिंदगी है।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com


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