अधूरी गिनतियां, अधूरी उड़ानें: शिक्षा का गिरता आधार
[46% अंक और 100% विफलता का खतरा]
भारतीय शिक्षा प्रणाली की नींव में गहरी दरारें उभरकर सामने आई हैं। दिसंबर 2024 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (परख) ने इस कड़वी सच्चाई को बेनकाब किया। 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 781 जिलों में फैले 74,229 सरकारी व निजी स्कूलों के 21,15,022 विद्यार्थियों और 2,70,424 शिक्षकों ने इस मूल्यांकन में हिस्सा लिया। परिणाम स्तब्ध करने वाले हैं: तीसरी कक्षा के महज 55% बच्चे 99 तक की संख्याओं को क्रमबद्ध लिख पाए, केवल 58% दो अंकों का जोड़-घटाव हल कर सके, और छठी कक्षा में गणित में औसतन 46% अंक ही प्राप्त हुए। ये आंकड़े चीखकर बताते हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था लाखों बच्चों को ठोस आधार देने में विफल रही है। यदि तत्काल सुधार नहीं हुए, तो शिक्षित और सशक्त भारत का सपना अधूरा ही रह जाएगा।
सर्वेक्षण ने प्राथमिक शिक्षा की कमजोर कड़ियों को और स्पष्ट किया। तीसरी कक्षा में केवल 55% विद्यार्थी 99 तक की संख्याओं को बढ़ते-घटते क्रम में लिख पाए, और 58% ही दो अंकों के जोड़-घटाव में निपुण थे। यह दर्शाता है कि तार्किक सोच का आधार, बुनियादी गणितीय कौशल, बच्चों तक नहीं पहुंच रहा। छठी कक्षा के हालात और चिंताजनक हैं, जहां केवल 53% विद्यार्थी जोड़, गुणा जैसी अंकगणितीय प्रक्रियाओं को समझ पाए। गणित में 46%, भाषा में 57%, और ‘द वर्ल्ड अराउंड अस’ में 49% अंक आए। शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने स्वीकार किया कि 50% से कम सही उत्तर सीखने की प्रक्रिया में गहरी खाई को उजागर करते हैं। जटिल शिक्षण पद्धतियां, शिक्षकों का अपर्याप्त प्रशिक्षण, और प्रायोगिक शिक्षण का अभाव इसके मूल कारण हैं। तुरंत प्रभावी कदम उठाना अनिवार्य है, वरना शिक्षा का यह संकट भारत के भविष्य को और अंधकारमय कर देगा।
नौवीं कक्षा के परिणामों ने कुछ उम्मीद की किरण दिखाई। केंद्रीय विद्यालयों (केवी) के छात्रों ने भाषा में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और विज्ञान व सामाजिक विज्ञान में भी प्रभावशाली अंक हासिल किए। यह केवी की गुणवत्तापूर्ण शिक्षण पद्धतियों और संसाधनों की बदौलत संभव हुआ। निजी स्कूलों के विद्यार्थियों ने विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन गणित में उनकी कमजोरी उजागर हुई। तीसरी कक्षा में केवी के छात्रों का गणित में सबसे कमजोर प्रदर्शन प्राथमिक शिक्षा में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में गणित में नतीजे निराशाजनक रहे, जबकि भाषा में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला। यह दर्शाता है कि भाषा शिक्षण में रचनात्मक और प्रभावी विधियां कारगर सिद्ध हो रही हैं, जिन्हें गणित शिक्षण में भी लागू करने की जरूरत है।
ग्रामीण और शहरी स्कूलों के बीच गहरी खाई चिंता का विषय है। आश्चर्यजनक रूप से, तीसरी कक्षा में ग्रामीण विद्यार्थियों ने गणित और भाषा में शहरी छात्रों को पछाड़ दिया। यह ग्रामीण स्कूलों में व्यक्तिगत ध्यान और समुदाय-केंद्रित शिक्षण का परिणाम हो सकता है। हालांकि, छठी और नौवीं कक्षा में शहरी विद्यार्थियों ने सभी विषयों में ग्रामीण छात्रों को पीछे छोड़ दिया, जो उच्च कक्षाओं में ग्रामीण स्कूलों में संसाधनों, प्रशिक्षित शिक्षकों और डिजिटल सुविधाओं की कमी को उजागर करता है। शिक्षा बजट इस संकट का मूल कारण है। भारत अपनी जीडीपी का केवल 4.6% शिक्षा पर खर्च करता है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के 6% लक्ष्य से काफी कम है। यह कमी ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढांचे, शिक्षक प्रशिक्षण और डिजिटल संसाधनों के अभाव के रूप में सामने आती है। यूनेस्को की 2023 की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि शिक्षा में निवेश न केवल शैक्षिक परिणामों को बेहतर करता है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक समानता को भी बढ़ावा देता है। परख सर्वेक्षण चेतावनी देता है कि शिक्षा बजट में तत्काल वृद्धि और इसका लक्षित उपयोग अब अपरिहार्य है।
भारतीय शिक्षा प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए तत्काल और निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है। पहला, गणित को जीवंत बनाने के लिए प्रायोगिक शिक्षण को अपनाया जाए। गणितीय खेल, दृश्य-श्रव्य सामग्री और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े उदाहरण बच्चों में रुचि जगा सकते हैं। एनसीईआरटी के डिजिटल मॉड्यूल्स को सभी स्कूलों में अनिवार्य करना एक प्रभावी शुरुआत हो सकती है। दूसरा, शिक्षकों का नियमित और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण अनिवार्य है। फिनलैंड की विश्व-प्रसिद्ध शिक्षक प्रशिक्षण प्रणाली को मॉडल बनाकर आधुनिक शिक्षण तकनीकों पर बल देना होगा। तीसरा, ग्रामीण स्कूलों में संसाधनों का विस्तार हो। गणित प्रयोगशालाएं, डिजिटल कक्षाएं और समृद्ध पुस्तकालय स्थापित किए जाएं। शिक्षा बजट का कम से कम 30% ग्रामीण शिक्षा के लिए लक्षित हो। चौथा, अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जाए। सामुदायिक कार्यशालाएं और जागरूकता अभियान इस दिशा में कारगर होंगे। पांचवां, केंद्रीय विद्यालयों की उत्कृष्ट शिक्षण पद्धतियों को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने के लिए एक शिक्षा सुधार आयोग का गठन हो। छठा, परख जैसे सर्वेक्षण वार्षिक आधार पर हों और उनके निष्कर्षों पर त्वरित नीतिगत कार्रवाई की जाए।
परख सर्वेक्षण एक सख्त चेतावनी है। 46% अंक और 50% से कम सही उत्तर देने वाले बच्चे चीख-चीखकर बता रहे हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था उनकी आकांक्षाओं को पंख देने में नाकाम रही है। यह समय कागजी योजनाओं को ठोस हकीकत में बदलने का है। हर बच्चे का हक है कि वह अपने सपनों को उड़ान दे सके। शिक्षा वह ज्वाला है जो अज्ञानता को भस्म करती है। इस ज्वाला को इतना प्रचंड बनाएं कि हर बच्चा अपने भविष्य को रोशन करे और भारत ज्ञान का सूरज बनकर विश्व पटल पर चमके। यदि हम आज चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। यह अज्ञानता के खिलाफ युद्ध है—और इसे हमें हर हाल में जीतना है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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